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किन्तु यह भी सत्य है कि अद्वैतवाद को ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त और सर्वदर्शन समन्वय का सूत्र बताया गया है। इस प्रकार सात-आठ शताब्दियों से योगवासिष्ठ–वेदान्त शाङ्कर अद्वैतवेदान्त का एकदेशी मत या एक प्रस्थान बन गया है । कुछ भी हो, योगवासिष्ठ - वेदान्त शाकर अद्वैत वेदान्त से जितना सन्निकट है उतना किसी भी अन्य दर्शन के सन्निकट नहीं है।
इस प्रकार योगवासिष्ठ एक अति महत्त्वपूर्ण वेदांत का ग्रन्थ है। इसका महत्त्व इससे भी प्रतीत होता है कि इसका मध्यकाल के शासकों (अकबर, जहाँगीर, दाराशिकोह ) के संरक्षण में कई फारसी अनुवाद किये गये थे । इसका ज्ञान तात्पर्य प्रकाश व्याख्या सहित योगवासिष्ठ की भूमिका से ज्ञात होता है । २० वीं शताब्दी में भीखनलाल आत्रेय योगवासिष्ठ पर कई अन्य ग्रन्थ लिखे और उन्होनें योगवासिष्ठ की तुलना पाश्चात्य प्रत्यय वाद से की है। महात्मागांधी योगवासिष्ठ के मुमुक्षु - व्यवहार - प्रकरण सर्वाधिक से प्रभावित थे।
खण्ड - ख
शङ्कर पूर्व अद्वैतवेदान्त का अव्यवस्थित इतिहास
अद्वैत वेदान्त के कुछ प्राचीन आचार्यों का नामाल्लेख ब्रह्मसूत्र में यत्र-तत्र उद्धृत मिलता है। इसे आर्ष- वेदन्त कहते हैं। इन आचार्यों की कोई भी कृतियां उपलब्ध नहीं हैं इसलिए इनका अव्यवस्थित इतिहास प्राप्त होता है। भगवान सूत्रकार नें अपनें ब्रह्मसूत्र में आचार्यों का उल्लेख किया है उनके नाम इस प्रकार हैं जो निम्नलिखित है
१. आत्रेय
४. कार्ष्णाजिनि
२. आश्मरथ्य
५. काशकृत्स्नः
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३- औडुलोमि
६. जैमिनि
७- वादरि
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