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केनोपनिषद् में ब्रह्म को वाणी से परे बताया गया है और कहा गया है कि जो वाणी से प्रकाशित नही होता किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होता है ।
शंकराचार्य ने वेदान्त में जिस अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन किया है उसका बीजरूप हमें माण्डूक्योपनिषद् में प्राप्त होता है । ब्रह्म न अन्तः प्रज्ञ है और न बहिःप्रज्ञ और न उभयप्रज्ञ। वह न ज्ञान, धन है, न प्रज्ञ है, न अप्रज्ञ है । वह अदृष्ट, अग्राह्य, अचिन्त्य और अव्यपदेश्य है। इसमें ब्रह्म की चार अवस्थाएं, पञ्चकोश, कारण, शरीरादि के समष्टि और व्यष्टिरूप और तुरीय शिव अवस्था का प्रतिपादन किया गया है। ब्रह्म में सभी प्रपञ्चों का उपशम हो जाता है वह शान्त, शिव और अद्वैत है।“प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ।" ( माण्डूक्य उपनिषद ६ / ७)
वेदान्त में 'माया' का वर्णन श्वेताश्वतर उपनिषद में मिलता है। इसमें प्रकृति को 'माया' और 'पुरूष' (महेश्वर) को मायिन् ( माया का स्वामी) कहा गया है- 'मायां तु प्रकृतिं विहान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' (श्वेताश्वतर ४/१०)
श्वेताश्वतर उपनिषद् में प्रकृति के तीनों गुणों एवं उनके लोहित, शुक्ल एवं कृष्ण रूपों का वर्णन है। सांख्य और योग में वर्णित प्रकृति के तीनों गुणों का बीजरूप में निर्देश है । '
वेदान्त में आचार्यशंकर द्वारा उद्धृत 'तत्वमसि' महावाक्य का मूल छान्दोग्य उपनिषद में प्राप्त होता है। इस उपनिषद् में उद्दालक मुनि द्वारा श्वेतकेतु को दिया गया उपदेश वर्णित है ।
'स च एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्व तत सत्यं स आत्मा तत्वमसि श्वेतकेतो इति । ' (छान्दोग्य ६–६–१२–३)| पुनर्जन्म से सम्बन्धित वर्णन हमें तीन उपनिषदों में मुख्य रूप से मिलता है ये उपनिषद हैं- छान्दोग्य, कठ, बृहदारण्यक । इसमें कहा गया है कि कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप ही अमरत्व की प्राप्ति हो
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