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गया है। सांख्य द्वारा स्वीकृत तीन प्रमाणों के प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द को योग भी स्वीकार करता है। सांख्य दर्शन की तरह योग दर्शन भी द्वैतवादी है और उसके तत्वशास्त्र को पूर्णतः स्वीकार करता है केवल ईश्वर को जोड़ देता है। इसलिये सांख्य और योग को 'समान तंत्र' कहा जाता है।
_ 'योग' शब्द युज् धातु में 'घन' प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। 'युज'-समाधै धातु 'दिवादिगणीय (आत्मने पद) में पायी जाती है- सांख्य योगशास्त्र में 'योग' शब्द का अभीष्ट अर्थ समाधि अर्थात चित्तवृत्ति का निरोध ही स्वीकार किया गया है।
१- 'योगः समाधिः स च सार्वभौमः चित्तस्य धर्मः ।' २- योगश्चित्त वृत्ति निरोधः समाधिः । (योग सूत्र १/२)
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सांख्ययोगदर्शन में प्रयुक्त 'योग' शब्द 'युज्' समाधौ धातु से ही 'घ' प्रत्यय लगाकर बना हुआ है। 'योग' शब्द का प्रचलित अर्थ 'मिलन' है अर्थात 'जीवात्मा का परमात्मा से मिलन।' योगियाज्ञवल्क्य में योग लक्षण दिया गया है 'संयोगों योग इत्युक्तः जीवात्मपरमात्मनोः ।'
योगसूत्र चार पादों में विभक्त है समाधि, साधन, विभूति, कैवल्य। समाधिपाद में चित्त को बाह्य विषयों से हटाकर पुरूष के वास्तविक स्वरूप में समाहित करने की विधि वर्णित है। साधनपाद में चित्त की बर्हिमुख वृत्तियों के निरोध और अन्तर्मुख सात्विक वृत्तियों के प्रवर्तन के उपायों का वर्णन है। विभूतिपाद में उन समस्त उपलब्धियों का वर्णन है जो योग से चित्त के शक्ति सम्वर्द्धन और पुरुष के स्वरूप बोध से होती है। कैवल्यपाद में पुरूष अपने विवेकख्याति से विशुद्ध, नितान्त निर्मल, चैतन्यस्वरूप में अवस्थित हो जाता है। चित्त:त्ति
'योगश्चित्तवृत्ति निरोधः' इस प्रथम सूत्र में कहा गया है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है और 'योगः समाधि' अर्थात् योग ही 'समाधि' है। वृत्ति से तात्पर्य
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