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चार प्रमाणों को स्वतंत्र रूप से स्वीकार करता है किन्तु वैशेषिक केवल दो प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान को ही मानता है तथा शब्द और उपमान को अनुमान के ही अन्तर्गत मान लेता है। दूसरा अन्तर, मुख्य रुप से पदार्थों को लेकर है। न्यायदर्शन जहाँ सोलह पदार्थों को मानता है वहां वैशेषिक दर्शन केवल सात पदार्थों को गिनाता है। वैशेषिक दर्शन ने 'ज्ञेयत्व' और 'अभिधेयत्व' को ध्यान में रखकर सप्त पदार्थों का परिगणन किया है। वैशेषिक दर्शन पदार्थों को दो भागों में विभाजित करता है- १. भाव पदार्थ २. अभाव पदार्थ । जिस वस्तु की सत्ता है उसे 'भाव पदार्थ' कहते हैं और जिसस वस्तु की सत्ता नहीं है उसे अभाव पदार्थ कहते हैं । भाव पदार्थ में 'सत्ता' और 'वृत्ति' का अन्तर किया गया है। जो देश और काल में विद्यमान रहे वह सत्ता है इस प्रकार द्रव्य, गुण, कर्म ऐसे भाव पदार्थ हैं । और जिसका दैहिक - कालिक अस्तित्व नहीं होता है उसे वृत्ति कहते हैं ।
द्रव्य, गुण, कर्म, समवाय, सामान्य, विशेष ये षट् भाव पदार्थ हैं और अभाव सातवां पदार्थ स्वयं एक मात्र अभाव पदार्थ के अन्तर्गत हैं । पाँच महाभूत, काल, दिक, आत्मा और मन ये नौ द्रव्य हैं। गुणों की सं० चौबीस तक बतायी गयी है। भौतिक जगत की व्याख्या भा० दर्शन में सांख्य और वैशेषिक मौलिक रुप से करते हैं।
उदयनाचार्य ने “द्रव्यगुण, कर्म, सामान्य, विशेष – समवायीनां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्वज्ञानं निःश्रेयस हेतुः । इस प्रशस्तपाद के प्रथम गद्यभाग की व्याख्या के सन्दर्भ में अपने ग्रन्थ 'किरणावली' में उल्लेख किया है- "निःश्रेयसं पुनः दुःख–निवृत्तिः आत्यर्त्तिकी अत्रयवादिनां अविवादि एव नहि अपवृक्तस्य दुखं प्रत्यापद्यत इति कश्चिदभ्युपैति । दुःख की आत्यान्तिक निवृत्ति निःश्रेयस है इसमें प्रतिपक्षियों को कोई विवाद नहीं है क्यों कि " दुःख से मुक्त होना' सब (निःश्रेयस) मोक्ष सबको मान्य है। उदयनाचार्य ने लिखा है यद्यपि दुःख का विनाश सीधे पुरुष प्रयत्न साध्य न होने से पुरुषार्थ नहीं है किन्तु दुःख के मूल कारण मिथ्याज्ञान का विनाश पुरुष के ज्ञान प्रयत्न
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