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________________ (८६) प्र० ६-गृहीत मिथ्याज्ञान किसे कहते हैं ? प्र० ७-गृहीत मिथ्याचारित्र किसे कहते है ? प्र. ८-जीवतत्व का स्वरूप क्या है ? प्र०९-"ताको न जान, विपरीत मान करि" का भाव क्या है ? प्र० १०-जीवतत्व सम्बन्धी जीव की भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र० ११-अजीवतत्व सम्बन्धी जीव की भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र० १२-आस्रवतत्व सम्बन्धी जीव को भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र० १३-बन्धतत्व सम्बन्धी जीव की भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र० १४-सवरतत्व सम्बन्धी जीव को भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र. १५-निर्जरातत्व सम्बन्धी जीव की भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरुप क्या है ? प्र० १६-मोक्षतत्व सम्बन्धी जीव को भूलरुप अगृहीत-गृहीत मिथ्यादर्शनादि का स्वरूप क्या है ? प्र० १७~-पर पदार्थों में तेरी-मेरी मान्यता को किस नाम से बताया है ? प्र. १८-सबसे बड़ा पाप क्या है ? प्र०१६-मिथ्यात्व को सप्त व्यसन से बड़ा पाप किस शास्त्र में कहां कहा है ? प्र० २०-मिथ्यादर्शनादि के कितने भेद है ?
SR No.010123
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages319
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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