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________________ इन ३४ - शुभभाव को नपुंसक, अपराध आदि कहने से तात्पर्य ? उत्तर - ज्ञान अर्थात् आत्मा अविकारी है । उसकी प्राप्ति किसी कार के शुभभावो से नही हो सकती है । एक मात्र भूतार्थ का लेकर अपना अनुभव करे तो 'ज्ञान अविकारी है' ऐसा 1 इन ३५ - "ज्ञान चैतन्य चमत्कार स्वरूप है" यह किस प्रकार -- उत्तर - केवलज्ञान मे त्रिकालवर्ती सर्व पदार्थों का सम्पूर्ण स्वरूप समय मे सर्व प्रकार से एक साथ स्पष्ट ज्ञात होता है । ऐसी ज्ञान की अचिन्त्य अपार शक्ति है और प्रत्येक आत्मा मे शक्ति से ऐसा ही स्वभाव है । ऐसा अरहत सिद्ध भगवान दर्शा रहे हैं। जिसने जाना, माना- तब 'ज्ञान चैतन्य चमत्कार स्वरूप है' कहा । -- इन ३६ - ' ज्ञान चैतन्य चमत्कार स्वरूप है' ऐसा छहढाला में बताया है ? उत्तर- " सकल द्रव्य के गुण अनन्त, परजाय अनन्ता । जाने एकै फाल, प्रगट केवल भगवन्ता ॥ ज्ञान समान न आन जगत मे सुख को कारण । इहि परमामृत जन्म जरामृति-रोग निवारन ॥ इसी कारण से ज्ञान को चैतन्य चमत्कार स्वरूप कहा है ।' [ प्रवचनसार गाथा २०० देखिएगा ] इन ३७ - ज्ञान चैतन्य चमत्कार स्वरूप है' जरा इसे खोल कर इये ? उत्तर -- ( १ ) अनेक प्रकार की अलग-अलग चीजे कभी इक्की हो सकती । परन्तु वे सब वस्तुएँ ज्ञान की एक समय की पर्याय साथ जानी जा सकती हैं । इसलिए 'ज्ञान चैतन्य चमत्कार
SR No.010120
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages323
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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