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________________ ( ३७ ) पर ऊपर से चिकनी चुपडी बाते करता है । अन्दर कपट रखता है । वह जीव उस समय 'जलकाय' ही है क्योकि "जैसी मति वैसी गति" होती है । ऐसे भाव के समय यदि आयु का वन्ध हो गया तो 'जल'काय' की योनि में जाना पडेगा । ३१ - कोई कहे हमे 'जलकाय' न बनना पड़े, उसका कोई प्रश्न उपाय है ? आत्मा का स्वभाव है । उसका नही जाना पडेगा, बल्कि मुक्ति उत्तर- छल कपट रहित तेरी आश्रय ले, तो जलकाय की योनि मे रूपी सुन्दरी का नाथ वन जावेगा । इन ३२ - क्या मनुष्यभव होने पर 'अग्निकार्य' कहला सकता उत्तर -- जैसे- रोटी बनाने के बाद तवे को उतारते है । तो तवे मे टिम - टिम की चिंगारियां दिखाती हैं। लोग कहते हैं कि तवा हँसता है | परन्तु वह वास्तव मे अग्निकाय के जीव हैं, उसी प्रकार जो मनुष्य भव पाने पर दूसरो को बढता हुआ देखकर ईर्ष्या करता है । उस समय वह जीव 'अग्निकाय' ही है, क्योकि "जैसी मति वैसी गति" होती है । यदि उस समय आयु का वन्ध हो गया तो 'अग्निकाय' की योनि में जाना पडेगा । जहाँ निरन्तर जलने में ही जीवन बीतेगा | प्रश्न ३३ -- कोई कहे अरे भाई हमे 'अग्निकाय' की योनि मे ना जाना पड़े। ऐसा कोई उपाय है ? उत्तर- ईर्ष्या रहित त्रिकाली स्वभाव है । उसका आश्रय ले, तो अग्निकाय की योनि मे नही जाना पडेगा । बल्कि पर्याय में तीन लोक का नाथ कहलायेगा । / प्रश्न ३४ - क्या मनुष्यभव होने पर 'वायुकाय' कहला सकता है ? उत्तर - जैसे- हवा के झोके कभी तेज कभी मन्द चलते रहते है, स्थिर नही रहते है, उसी प्रकार जो मनुष्य भव पाने पर भी जहाँ
SR No.010120
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages323
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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