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________________ (. ३० ) समय-समय में घटता है । वह समय-समय मे मरण है यह आवीचिका मरण है ।" देखो इसमे बताया है, समय-समय का मरण होता है, क्योकि पर्याय की स्थिति एक समय की होती है। सूक्ष्म ऋजुसूत्र नय की अपेक्षा एक-एक समय का एक-एक भव है । जिस समय जो जीव जो भाव करता है उस समय वह वही है । इसलिये कहा है " जैसी मति, वैसी गति" और आयु पूर्ण होने के समय " जैसी गति, वैसी मति" हो जाती है । प्रश्न - "जैसी मति, वैसी गति और जसी गति वैसी मति" के पीछे दया रहस्य है ? उत्तर - यदि कोई गति धारण न करनी हो, तो अनादिअनन्त ज्ञायक स्वभावी तेरी आत्मा है । उसका आश्रय लेकर इनका अभाव करना ही प्रत्येक पात्र जीव का परम कर्तव्य है । प्रश्न - क्या मनुष्यभव होने पर 'साँप' कहला सकता है ? उत्तर -- मनुष्य भव होने पर जैसे हमारे घर मे बहुत से आदमी है । यदि हम फूँ फाँ ना करे तो वह सव बिगड जावे । ऐसा मानकर जो फूँ फाँ करता है । वह उस समय मनुष्यभव होने पर भी वह ही है, क्योकि " जैसी मति वैसी गति" होती है। फूँ फाँ करते समय यदि आयु का वध हो गया तो साँप की योनि में जाना पडगा, जहाँ निरन्तर फूंफ में ही जीवन बीतेगा । प्रश्न १० - कोई कहे अरे भाई हमे सांप नहीं बनना है, क्यो कि साँप की योनि बहुत बुरी हैं। तो वह क्या करे ? उत्तर - फूँ फाँ रहित आत्मा का स्वभाव है । उसका श्र तो भगवान के समान ज्ञाता ज्ञ ेय बुद्धि प्रगट हो जावे और संसार के सम्पूर्ण दुख का अभाव हो जावे । प्रश्न ११ - स्वभाव का आश्रय लेना किस प्रकार बने ? उत्तर- "अनादिनिधन वस्तुएँ भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती है । कोई किसी के आधीन नहीं है । कोई
SR No.010120
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages323
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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