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________________ ( १६५ ) है और वहां किस व्यवहार की बात ही नहीं है ? उत्तर-ग्यारहवी गाथा मे अध्यात्म का जो चार प्रकार का व्यवहार है, उसे अभूतार्थ कहा है । आगम के व्यवहार की वात ११वी गाथा मे नही है। जब अध्यात्म के व्यवहार का निपेध है, तब आगम के व्यवहार की कौन बात है ? अर्थात कुछ भी नही। प्रश्न २२-चार प्रकार के आगम का व्यवहार कौन-कौन सा है ? उत्तर-(१) उपचरित सद्भत व्यवहारनय -जो उपाधि सहित गुण गुणी को भेद रूप से ग्रहण करे। जैसे-ससारी जीव के मतिज्ञानादि पर्याय और नर-नारकादि पर्याये । (विकारी पर्यायो को जीव की कहना)। (२) अनुपचरित सद्भुत व्यवहारनय -जो निरुपाधिक गुण और गुणी को भेद रूप ग्रहण करे। जैसे केवलज्ञान, केवलदर्शन । (शुद्ध पर्याय को जीव की कहना)। (३) उपचरित असदभूत व्यवहारनय -अत्यन्त भिन्न पदार्थों को जो अभेद रूप से ग्रहण करे। जैसे-जीव के महल, घोडा वस्त्रादि कहना । (अत्यन्त भिन्न पर पदार्थों को जीव का कहना) (४) अनुपचरित असद्भुत व्यवहारनय -जो नय सयोग सम्बन्ध से युक्त दो पदार्थों के सम्बन्ध को विषय बनाये । जैसे-जीव का शरीर जीव का कर्म आदि कथन ॥ (एक क्षेत्रावगाही शरीर और कर्म को आत्मा का कहना) ११वी गाथा मे इस आगम के व्यवहार की तो वात ही नही है। . प्रश्न २३-चार प्रकार का मागम का व्यवहार कब और किसको लागू पड़ता है ? ___ उत्तर-एकमात्र अपना अनुभव-ज्ञान होने पर साधक जीवो को ही लागू पडता है और मिथ्यादृष्टि और केवली को लागू नही पड़ता है।
SR No.010120
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages323
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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