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________________ * जेल में मेरा जैनाभ्यास * [द्वितीय ३ – तीसरे गुणस्थान में अनन्तानुबन्धि चतुष्क नहीं हैं; क्योंकि उसका उदय दूसरे गुणस्थान तक ही है तथा इस गुणस्थानके समय मृत्यु न होनेके कारण अपर्याप्त अवस्था भावीकार्मण, औदारिकमिश्र और वैक्रियमिश्र, ये तीन योग भी नहीं होते। इस प्रकार तीसरे गुणस्थान में सात बन्ध- हेतु घट जाने से उक्त पचास में से शेष तेतालीस बन्ध हेतु हैं । १६० ४ - चौथा गुणस्थान अपर्याप्त अवस्था में भी पाया जाता है; इसलिये इसमें अपर्याप्त अवस्था भावी कार्मण, औदारिकमिश्र और वैक्रियमिश्र, इन तीन योगोंका होना सम्भव है । तीसरे गुणस्थान-सम्बम्बी तेतालीस और ये तीन योग, कुल छयालीस बन्धहेतु चौथे गुणस्थान में समझने चाहिये । · ५–अप्रत्याख्यानावरण-चतुष्क चौथे गुणस्थान तक ही उदय में रहता है, आगे नहीं । इस कारण वह पाँचवें गुणस्थान में नहीं पाया जाता । पाँचवाँ गुणस्थान देशविरतिरूप होनेसे उसमें त्रसहिंसारूप स अविरति नहीं है तथा यह गुणस्थान केवल पर्याप्त अवस्था भावी है; इस कारण इसमें अपर्याप्त अवस्था भावी कार्मर और औदारिक मिश्र, ये दो योग भी नहीं होते । इस तरह चौथे गुणस्थानसम्बन्धी छयालीस हेतुश्रोंमेंसे उक्त सातके सिवाय शेष उन्तालीस बन्धहेतु पाँचवें गुणस्थान में होते हैं ।
SR No.010089
Book TitleJail me Mera Jainabhayasa
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages475
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size28 MB
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