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________________ अग्रवालों का जैन धर्म में योगदान १६५ प्रागरा में एक जिन मंदिर का निर्माण कराया पना की । इनकी प्रतिष्ठा का कार्य वि० सं० पा, जिसका उल्लेख कविवर भगवतीदास अग्रवाल १६३० ( ई० सन् १५७३ ) में द्वादशी बुधवार (सं० १६५१-१७००) ने अपनी वि० सं० १६५१ के दिन प्रातः ६ घड़ी व्यतीत होने पर सूरि मन्त्र सन् १५६४ में रची जाने वाली 'अर्गलपुर जिन- पूर्वक किया । उस समय साहु टोडर ने चतुर्विध वन्दना' नाम की कृति में किया है। इससे संघ को प्रामन्त्रित किया था और सभी ने साह स्पष्ट है कि साहु टोडर ने उक्त मन्दिर सं० १६५१ टोडर को शुभाशीर्वाद दिया था। संवत् १६३२ से पूर्व ही बनाया था। उनके उस मन्दिर में उस में इन्होंने कविराजमल जी से जम्बूस्वामिचरित समय प्रात्म-साधिका हमीरी बाई नाम की एक की रचना करवाई थी । अन्वेषण करने पर ब्रह्मचारिणी रहती थी, जिसका तपश्चरण से साह टोडर के और भी धार्मिक कार्यों का परिचय शरीर क्षीण हो रहा था और जो सम्मेद शिखर मिल सकता है। को यात्रा करके वापिस प्राई थी। साह टोडर के ज्येष्ठ पुत्र रिषीदास या ऋषभमथरा के ५१४ स्तपों का जीर्णोद्धार कार्य दास ने अपने सुनने के लिए ज्ञानार्णव की संस्कृत एक समय साह टोडर सिद्ध क्षेत्र की यात्रा टीका प्रागरा के तात्कालिक विद्वान पं० नयविलास करने मथुरा गये थे। वहां उन्होंने मध्य में बना से बनवाई थी। पं० नयविलास जो संस्कृत के हुप्रा जम्बू स्वामी का स्तूप देखा, और उसके चरणों सुयोग्य विद्वान थे, और उस समय प्रागरा में में विद्य च्चर मुनि का स्तूप देखा, तथा पास-पास बने हो रहते थे। प्रागरा में अनेक विद्वान, भट्टारक हा रहत हुए अन्य साधुनों के स्तूप देखे, जिनकी संख्या कहीं और धष्ठिजनों का प्रावास था, जो निरन्तर पांच, कहीं पाठ, कहीं १० और कहीं २० भी थी। अपने धर्म का अनुष्ठान करते हुये जीवन यापन साहु टोडर ने उनकी जीर्ण-शीर्ण दशा देखी, जिससे करते थे। उन्हें दुःख हुमा मोर तत्काल ही उनके समुद्धार पांडे राजमल ने साहु टोडर के ज्येष्ठ पुत्र की भावना बलवती हो उठी । फलतः उन्होंने ऋषभदास के लिये पंचाध्यायी के निर्माण करने शुभ दिन शुभ लग्न में उनके समुद्धार का कार्य का विचार किया था, किन्तु उनके दिवंगत हो प्रारम्भ कर दिया । साह टोडर ने इस पुनीत कार्य जाने से वह कार्य पूर्ण न हो सका । इस तरह में बहुत भारी द्रव्य व्यय किया और ५०१ साहु टोडर और उनके परिवार में जंन धर्म की स्तूपों का एक समूह और तेरह स्तूपों का दूसरा प्रास्था और धर्मानुष्ठान होता रहा । इस तरह कुल ५१४ स्तूपों का निर्माण कराया। भादानक देश के श्री प्रभुनगर में अग्रवाल वंशी इन स्तूपों के पास ही १२ द्वारपाल प्रादि की स्था- मित्तल गोत्रीय साहु लखमदेव के चतुर्थ पुत्र १. टोडरसाहु करायो जिनहर रह हमीरी बाई हो। तपलंकृत वपु प्रति कृशकाया जात शिखरि कर पाई हो। जात शिखरि कर पाई वतिका विहि थल पूज कराई, बंधो देव जिनेश जगत्पति मस्तक मेइणि लाई। देखो जैन संदेश शोषांक भी० २३ सं० २५ पृ० १६१ २. शताना पंच चापैकं शुखं चाधित्रयोदश । स्तूपानां तत्समीपे च द्वादशकारिकादिकम् ।। संवत्सरे गताब्दानां शतानां षोडशं क्रमात । शुद्ध स्त्रिश साधिकं दधति स्फुटम् ॥ -जंबू स्वामि चरित ११५, ११६ पृ०१३
SR No.010079
Book TitleBabu Chottelal Jain Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorA N Upadhye, Others
PublisherBabu Chottelal Jain Abhinandan Samiti
Publication Year1967
Total Pages238
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth
File Size11 MB
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