________________ 472 जैनतत्त्वादर्श भरा हुआ है, एक के ऊपर मेहरवान होता है, और एक का विनाश करता है; स्त्री के भोग विलास में मग्न है; अरु अनेक प्रकार के शस्त्र जिस के हाथ में हैं। अपनी ठकुराइ का अभिमानी है; जाप के वास्ते हाथ में माला है; सावध भोगपंचेंद्रिय का वध चाहता है। ऐसे देव को जो पुरुष परमेश्वर माने, अथवा परमेश्वर का अंश रूप अवतार माने और पूजे; तिस के कहे हुये शास्त्र के अनुसार हिंसाकारी यज्ञादि फरे; अनेक तरे के पाप कार्यों में धर्म के नाम से प्रवृत्ति करे / इस लौकिक देव के अनेक भेद हैं। सो सब मिथ्यात्वसत्तरी प्रमुख ग्रन्थों से जान लेने। 2. लौकिक गुरुगत मिथ्यात्व-जो अठारह पापों का सेवन करे; नव प्रकार का परिग्रह रक्खे, गृहस्थाश्रम का उपभोग करेः स्त्री, पुत्र, पुत्री के परिवार वाला होवे; तथा कुलिगी-मनाकल्पित नवा नवा वेष बना कर स्वकपोलकल्पित मत चलावे: अरु आडम्बरी होवे; बाह्य परिग्रह तो त्याग दिया है, परंतु अभ्यंतर ग्रन्थि छोड़ी नहीं; गुरु नाम धरावे, मंडली से विचरे: जिस की अनादि भूल मिटी नहीं: और जिस को शुद्ध साध्य की पिछान नहीं; तिस को गुरु माने; तिस का बहुमान करे; तिस को मोक्ष का हेतु जान कर दान देवे; तथा उस को परम पात्र जाने / 3. लौकिक पर्वगत मिथ्यात्व--१. अजापड़वा, 2. प्रेतदूज, 3. गुरुतीज, 4. गणेश . चौथ, 5. नागपंचमी, 6. झोलना