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________________ तीसरा भाग । काज करत पर घरन के, अपना काज विगार | सीत निवारे जगत की, अपनी झुपरी वार ||१६|| नहिं विचार तैंने किया, करना था क्या काज | उदै होयगा कर्म फल, तव उपजेगी लाज ॥१७॥ झूठे संसारीन की, छूटेगी जब लाज । इनसों अलगा होयगा, तत्र सुधरेगा काज || १८|| अपनी पूँजी सू करौ, निश्चल कार बिहार । वाध्या सो ही भोगले, मति कर और उधार ||१९|| नया कर्म ऋण काढ़ि के, करसी कार बिहार । देखा पड़सी पार का, किम होसी छुटकार ||२०|| विपय भाग किपाक सम, लखि दुख फल परिणाम । जब विरक्त तू होयगा, तत्र सुधरेगा काम ॥२१॥ येरे मन मेरे पथिक, तू न जाव वहँ ठोर । वटमारा पाँचू जहाँ, करें साह कू चोर ||२२|| आरभ विषय कपाय कूं, कीनी बहुत हि वार | कछु कारज सरिया नहीं, उलटा हुआ खुवार ||२३|| चारूँ सँज्ञ में सदा, सुतै निपुन चित लाग । 4 २९ गुरु समभावे कठिन सूँ, उपजै तउ न विराग ||२४|| खैर हुआ जो कुछ हुआ, अब करनो नहिं जोग । विना विचारे तैं किया, ताको ही फल भोग ॥२५॥ 1
SR No.010061
Book TitleJain Shiksha Part 03
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages388
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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