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________________ जैनशासन "नक चक्र मगरादि मच्छ करि भय उपजावै । जामें बड़वा-अग्नि दाहते नीर जलावै ॥ पार न पावै जास थाह नहि लहिए जाकी । गरजै प्रति गंभीर लहरकी गिनती न ताकी ॥ सुख सौ तिरं समुद्रको जे तुम गुन सुमराहि । लोल कलोलनके शिखर पार मान ले जाहि ॥ ४४ ॥" मानग मुनिवरने कितने सुन्दर सानुप्रास पद्य द्वारा जिनेन्द्रकी महिमा बताई है - ३८६ 1 " नात्यदभुतं भवनभूषण भूतनाथ, भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन कि वा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ १०॥ " इस पद्यमे 'भकार' की एकादश वार आवृत्ति विशेष ध्यान देने योग्य है | हिन्दी अनुवाद मूलके सौन्दर्यका प्रतिविम्ब तो न आ सका। उसमे उसका भाव इस प्रकार बताया है "न हि अचंभ जो होहि तुरन्त । तुमसे तुम गुण वरणत सन्त ॥ जो अधनीको श्राप समान । करें न सो निन्दित धनवान || " आचार्य मानतुंग जिनेन्द्रदेवको बुद्ध, शकर, विधाता, पुरुषोत्तम शव्दोसे सवोधित करते हुए अपने गुणानुराग को इन गंभीर शब्दो द्वारा स्पष्ट करते है "बुद्धस्त्वमेव विबुधाचितबुद्धिबोधात् त्वं शङ्करोऽसि भुवनत्रयशङ्करत्वात् । धातासि घोर शिव-मार्ग - विधेविधानात् व्यक्त त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ " कविरत्न श्री गिरिधर शर्माने इसे इस रूपमें लिखा है"तू बुद्ध हैं विबुध पूजित बुद्धिवाला कल्याण कर्तृवर शंकर भी वही है ।
SR No.010053
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1950
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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