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________________ * साधु * [ ३१६ (१८) अष्टापद-अष्टापा, जुत्रा आदि खेलना । (१६) नालिक-चौपड़, सतरंज आदि खेलना। (२०) छत्र-सिर पर छतरी या छत्र धारण करना । (२१) चिकित्सा-विना कारण बलवृद्धि आदि के लिए औषध लेना या वैद्य की तरह दूसरों की चिकित्सा करना । (२२) उपानह-जूते, खड़ाऊँ, मोजे आदि पैरों में पहनना । (२३) जोतिःप्रारम्भ-दीपक, चून्हा आदि जलाकर या अन्य किसी प्रकार से अग्नि का आरम्भ करना । (२४) शय्यातरपिण्ड-जिसकी आज्ञा लेकर मकान में उतरे उसके घर का आहार-पानी आदि ग्रहण करना । ___(२५) श्रासंदी-खाट, पलंग, कुर्सी आदि किसी भी बुने हुए प्रासन पर बैठना। (२६) गृहान्तरनिषद्या--रोग, तपश्चर्या और वृद्धावस्था रूप कारणों के बिना ही गृहस्थ के घर में बैठना । _ (२७) गात्रमर्दन–शरीर पर पीठी आदि लगाना। (२८) गृहिवैयावृत्य-स्वयं गृहस्थ की सेवा करना तथा गृहस्थ से सेवा कराना। (२६) जात्याजीविका-जातीय संबंध जोड़कर, सगा-संबंधी बनकर आहार आदि प्राप्त करना। (३०) तप्तनिवृत्त-जिस बर्तन में पानी गर्म किया जाय वह ऊपर, नीचे और बीच में, इस तरह तीनों स्थानों से गर्म न हुआ हो, फिर भी उस पानी को ग्रहण कर लेना । (३१) आतुर-स्मरण-रोगों से या अन्य दुःखों से घबराकर, परीपह और उपसर्ग आने पर दुःखी होकर गृहस्थावस्था का या कुटुम्बीजनों का स्मरण करना। (३२) मूलक (३३) अदरख (३४) इक्षुखण्ड* (साठे के टुकड़े) (३५) बिना गाँउ का अचित्त हुभा टुकड़ा लेने में यह दोष नहीं है ।
SR No.010014
Book TitleJain Tattva Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherAmol Jain Gyanalaya
Publication Year1954
Total Pages887
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size96 MB
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