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________________ श्री जैन पूजा-पाठ संग्रह | जो प्रमादवशि होय विराधे जीव घनेरे, तिनको जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे । सो सब झूठो होउ जगतपति के परसाई, जा प्रसाद मिले सर्व सुख दुख न ला || ६ | मैं पापी निर्लज दया करि हान महाशठ, किये पाप अथ ढेर पापमति होय चित्त दुठ | निंदू हूं मैं बार बार निज जियको गरहुँ, सबविधि धर्म उपाय पाये फिर पापहि करहूं ||७|| दुर्लभ है नरजन्म तथा श्रावक कुल भारी, सतसंगति संजोग धमं जिन श्रद्धा धारी । जिन वचनामृत धार समातें जिनवानी, तोहू जीव संहारे विकधिक विक हम जानी ||८|| इन्द्रियलंपट होय खोय निज ज्ञान जमा सत्र, अज्ञानी जिमि करें तिमी विधि हिंसक हूँ अब । गमनागमन करतो जीव विराधे भोले, ते सब दोष किये निंदूं अब मन वच तोले ||९| आलोचनविधि की दोप लागे जु घनेरे, ते सब दोष विनाश होउ तुम तैं जिन मेरे । बारवार इस भांति मोहमद दोप कुटिलता, ईपादिकर्ते भये निंदिये जे भयभीता ॥ १० ॥ ॥९॥ २६१
SR No.010003
Book TitleJain Pooja Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahavir Prakash Jain Thekedar Delhi
PublisherMahavir Prakash Jain Thekedar Dehli
Publication Year
Total Pages359
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size13 MB
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