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सद्धर्मसंरक्षक ९- श्रीउववाईसूत्र में बहुत जिनमन्दिरों का अधिकार है।
१०- इसी सूत्र में अंबड श्रावक के जिनप्रतिमापूजन का अधिकार है।
११- श्रीरायपसेणीसूत्र में सूर्याभदेवता के जिनप्रतिमा वांदनेपूजने का वर्णन है।
१२- इसी सूत्र में चित्र सारथी तथा परदेशी राजा (इन दोनों श्रावकों) के जिनप्रतिमा पूजने का वर्णन है।
१३- श्रीजीवाजीवाभिगमसूत्र में विजयदेवता आदि देवताओं के जिनप्रतिमा पूजने का वर्णन है।
१४- श्रीजम्बूद्वीप-पण्णत्ति में यमकदेवता आदि के जिन प्रतिमा पूजने का वर्णन है।
१५- श्रीदशवैकालिकसूत्र की नियुक्ति में श्रीशय्यंभवसूरि को श्रीशांतिनाथजी की प्रतिमा को देखकर प्रतिबोध पाने का वर्णन है।
१६- श्रीउत्तराध्ययनसूत्र की नियुक्ति के दसवें अध्ययन में श्रीगौतमस्वामी के अष्टापद तीर्थ की यात्रा करने का वर्णन है।
१७- इसी सूत्र के २९वें अध्ययन में थय-थुई-मंगल में स्थापना को वन्दन करने का वर्णन है।
१८- श्रीनन्दीसूत्र में विशाला नगरी में मुनिसुव्रतस्वामी का महा-प्रभाविक थूभ (स्तूप) कहा है।
१९- श्रीअनुयोगद्वारसूत्र में स्थापना माननी कही है।
२०- श्रीआवश्यकसूत्र में भरतचक्रवर्ती के जिनमंदिर बनाने का वर्णन है।
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013)/(1st-11-10-2013)(2nd-22-10-2013) p6.5
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