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________________ ऋषभदेव परमात्मा के ध्यान में लयलीन बने, जटारूपी मुकुट के धारक कुलपति के दूर से दर्शन होते ही दुर्गंधा के निस्तेज देह में नया जोश आ गया । कुलपति के समीप आकर दुर्गंधा जैसे ही नमस्कार करती है तब कुलपति भी क्षणभर के लिए उसके देह की दुर्गंध के प्रति दुर्भाव दर्शाकर पूछते हैं, "हे वत्सा ! तेरे देह से ऐसी भयंकर दुर्गंध क्यों आ रही है ? इस घोर वन में दुःखी होकर क्यों घूम रही हो? तुम यहाँ क्यों आयी हो?" कुलपति के आश्वासन भरे वचनों को सुनकर आँखों के आँसू पोंछते हुए दुर्गंधा जन्म से अपने दुःख की कथनी सुनाती है। जीवन से हारी हुई भाग्यहीन दुर्गंधा स्वदुःख निवारण के लिए कुलपति को उपाय बताने के लिए विनंती करती है। तब कुलपति कहते हैं, "हे वत्सा ! मैं केवलज्ञानी नहीं हूँ कि तेरे पूर्व भवों के कर्मों को बता सकूँ। फिर भी तुम शत्रुजय महातीर्थ की स्पर्शना करके रैवतगिरि तीर्थ की यात्रा करने जाओ। केवलीभगवंतों ने भी जिसकी महिमा बतायी है ऐसे गजेन्द्रपद कुंड के निर्मल जल से स्नान करने से तुम्हारे अशुभ कर्म नाश होंगे।" _ कुलपति के अमृत वचन सुनकर अत्यन्त हर्षित बनी दुर्गधा कुलपति के चरणकमलों को नमस्कार करती है । शजय और गिरनार का स्मरण करते-करते वह सिद्धगिरि के सान्निध्य में आती है। गिरिराज को प्रदक्षिणा देकर युगादिजिन ऋषभदेव परमात्मा की सेवा भक्ति करके वह रैवतगिरि की तरफ प्रयाण करती है। रैवतगिरि की शीतल छाया में आकर उत्तरदिशा की तरफ के मार्ग से वह रैवताचल पर्वत पर आरोहण करती है। परन्तु अभी तक भारी कर्मी होने के कारण उसे गजपदकुंड में स्नान करने के लिए और जिनभवन में प्रवेश करने के लिए रोका जाता है। दुर्गंध के कारण वह प्रवेश प्राप्त करने में असमर्थ बनती है, तब गजपदकुंड से बाहर लाए हुए पवित्र जल से नित्य स्नान करने से सातवें दिन वह संपूर्णरूप से दुर्गंध से मुक्त हुई और सुगंधीपन को प्राप्त कर दुर्गंधा गजेन्द्रपद कुंड में स्नान करके खूब भक्तिभाव से जिनेश्वर परमात्मा की पूजा करने जाती रैवताचलमंडन श्री नेमिप्रभु की पूजा के सद्भाग्य से आनंदविभोर बनी दुर्गंधा जैसे ही बाहर निकलती है, उसे केवलीभगवंत का समागम होता है। पूर्व भव के वृत्तान्त को जानने के लिए उत्सुक बनी दुर्गंधा केवली भगवंत से अपने पूर्व भव की कथा पूछती है। तब केवली भगवंत कहते हैं, "हे भद्रा ! तू पूर्वभव में ब्राह्मण कुल में जन्मी थी । अति शौचवाद के कारण तुमने श्वेताम्बर जैन साधु भगवंतों की मजाक की थी। हा! हा! ये श्वेतांबर साधु तो वन में घूमते हैं और स्नान शौच नहीं करते। ये दुर्गंध से भरे हुए हैं और अत्यन्त उज्ज्वल वस्त्रों को भी अपने देह के मैल से मलिन करते हैं। ऐसे वचनों से जैन श्वेतांबर
SR No.009951
Book TitleChalo Girnar Chale
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemvallabhvijay
PublisherGirnar Mahatirth Vikas Samiti Junagadh
Publication Year
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size450 KB
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