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आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद
को हाथ जोड़कर, मस्तक पर अंजलि लगाकर जय-विजय से बधाते हैं । वे इस प्रकार बोलेहे देवानुप्रिय ! आपकी विजया राजधानी के सिद्धायतन में जिनोत्सेधप्रमाण एक सौ आठ जिन (अरिहंत) प्रतिमाएँ रखी हुई हैं और सुधर्मासभा के माणवक चैत्यस्तम्भ पर वज्रमय गोल मंजूषाओं में बहुत-सी जिन-अस्थियाँ रखी हुई हैं, जो आप देवानुप्रिय के और बहुत से विजया राजधानी के रहने वाले देवों और देवियों के लिए अर्चनीय, वन्दनीय, पूजनीय, सत्कारणीय, सम्माननीय हैं, जो कल्याणरूप, मंगलरूप, देवरूप, चैत्यरूप तथा पर्युपासना करने योग्य हैं । यह आप देवानुप्रिय के लिए पूर्व में भी श्रेयस्कर है, पश्चात् भी श्रेयस्कर है यावत् पहले और बाद में हितकारी यावत् साथ में चलने वाला होगा, ऐसा कहकर वे जोर-जोर से जय-जयकार. शब्द का प्रयोग करते हैं ।
उन सामानिक पर्षदा के देवों से ऐसा सुनकर वह विजयदेव हृष्ट-तुष्ट हुआ यावत् उसका हृदय विकसित हुआ । वह देवशयनीय से उठता है, देवदूष्य युगल धारण करता है, देवशयनीय से नीचे उतरता है, उपपातसबा से पूर्व के द्वार से बाहर निकलता है और जिधर ह्रद है उधर जाता है, हृद की प्रदिक्षणा करके पूर्वदिशा के तोरण से उसमें प्रवेश करता है और पूर्वदिशा के त्रिसोपानप्रतिरूपक से नीचे उतरता है और जल में अवगाहन करता है । जलमज्जन
और जलक्रीडा करता है । इस प्रकार अत्यन्त पवित्र और शुचिभूत होकर हृद से बाहर निकलता है और जिधर अभिषेकसबा है उधर जता है । अभिषेकसभा की प्रदक्षिणा करके पूर्वदिशा के द्वार से उसमें प्रवेश करता है और पूर्वदिशा की ओर मुख करके सिंहासन पर बैठ जाता है ।
तदनन्तर उस विजयदेव की सामानिक पर्षद के देवों ने अपने आभियोगिक देवों को बुलाया और कहा, शीघ्र ही विजयदेव के महार्थ, महाघ, महार्ष, और विपुल इन्द्राभिषेक की तैयारी करो । तब वे आभियोगिक देव हृष्ट-तुष्ट हुए यावत् उनका हृदय विकसित हुआ । हाथ जोड़कर मस्तक पर अंजलि लगाकर विनयपूर्वक उन्होंने उस आज्ञा को स्वीकार किया । वे उत्तरपूर्व दिशाभाग में जाते हैं और वैक्रिय-समुद्घात से समवहत होकर संख्यात योजन का दण्ड निकालते हैं रत्नों के यावत् रिष्टरत्नों के तथाविध बादर पुद्गलों को छोड़ते हैं और यथासूक्ष्म पुद्गलों को ग्रहण करते हैं । तदनन्तर दुबारा वैक्रिय समुद्घात से समवहत होते हैं
और १००८-१००८ सोने के, चाँदी के, मणियों के, सोने-चांदी के, सोने-मणियों के, चांदीमणियों के और मिट्टी के कलश, एक हजार आठ झारियां, इसी प्रकार आदर्शक, स्थाल, यावत् लोमहस्तपटलक, १०८ सिंहासन, छत्र, चामर, ध्वजा, तेलसमुद्गक और १०८ धूप के कडुच्छुक अपनी विक्रिया से बनाते हैं । उन स्वाभाविक और वैक्रिय से निर्मित कलशों यावत् धूपकडुच्छुकों को लेकर विजया राजधानी से निकलते हैं और उस उत्कृष्ट यावत् उद्धृत दिव्य देवगति से तिरछी दिशा में असंख्यात द्वीप समुद्रों के मध्य से गुजरते हुए जहाँ क्षीरोदसमुद्र हैं वहाँ आते हैं और वहाँ का क्षीरोदक लेकर वहाँ के उत्पल, कमल यावत् शतपत्र-सहस्रपत्रों को ग्रहण करते हैं । वहाँ से पुष्करोदसमुद्र पुष्करोदक और उत्पल, कमल यावत् शतपत्र, सहस्रपत्रों को लेते हैं । वहाँ से वे समयक्षेत्र में जहाँ भरत-ऐवत वर्ष (क्षेत्र) हैं और जहाँ मागध, वरदाम
और प्रभास तीर्थ हैं वहाँ आकर तीर्थोदक को और तीर्थों की मिट्टी लेकर गंगा-सिन्दु, रक्तास्तवती महानदियाँ का जल और नदीतटों की मिट्टी लेकर जहाँ क्षुल्ल हिमवंत और शिखरी