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जीवाजीवाभिगम-१/-/३३
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[३३] बादर तेजस्कायिकों का स्वरूप क्या है ? बादर तेजस्कायिक अनेक प्रकार के हैं, कोयले की अग्नि, ज्वाला की अग्नि, मुर्मुर की अग्नि यावत् सूर्यकान्त मणि से निकली हुई अग्नि और भी अन्य इसी प्रकार की अग्नि । ये बादर तेजस्कायिक जीव संक्षेप से दो प्रकार के हैं-पर्याप्त और अपर्याप्त । भगवन् ! उन जीवों के कितने शरीर कहे गये हैं ? गौतम ! तीन, औदारिक, तैजस और कार्मण । शेष बादर पृथ्वीकाय की तरह समझना । अन्तर यह है कि उनके शरीर सइयों के समुदाय के आकार के हैं, उनमें तीन लेश्याएँ हैं, जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट तीन रात-दिन की है । तिर्यंच और मनुष्यों से वे आते हैं और केवल एक तिर्यंचगति में ही जाते हैं । वे प्रत्येकशरीर वाले हैं और असंख्यात कहे गये हैं।
[३४] वायुकायिकों का स्वरूप क्या है ? वायुकायिक दो प्रकार के हैं, सूक्ष्म वायुकायिक और बादर वायुकायिक । सूक्ष्म वायुकायिक तेजस्कायिक की तरह जानना । विशेषता यह है कि उनके शरीर पताका आकार के हैं । ये एक गति में जानेवाले और दो गतियों से आने वाले हैं । ये प्रत्येकशरीरी और असंख्यात लोकाकाशप्रदेश प्रमाण हैं ।
बादर वायुकायिकों का स्वरूप क्या है ? बादर वायुकायिक जीव अनेक प्रकार के हैं, पूर्वी वायु, पश्चिमी वायु और इस प्रकार के अन्य वायुकाय । वे संक्षेप से दो प्रकार के हैंपर्याप्त और अपर्याप्त । भगवन् ! उन जीवों के कितने शरीर हैं ? गौतम ! चार, औदारिक, वैक्रिय, तैजस और कार्मण । उनके शरीर ध्वजा के आकार के हैं । उनके चार समुद्घात होते हैं वेदनासमुद्धात, कषायसमुद्घात, मारणांतिकसमुद्घात और वैक्रियसमुद्घात । उनका आहार व्याघात न हो तो छहों दिशाओं के पुद्गलों का होता है और व्याघात होने पर कभी तीन दिशा, कभी चार दिशा और कभी पांच दिशाओं के पुद्गलों के ग्रहण का होता है । वे जीव देवगति, मनुष्यगति और नरकगति में उत्पन्न नहीं होते । उनकी स्थिति जघन्य से अंतर्मुहूर्त
और उत्कृष्ट से तीन हजार वर्ष की है । शेष पूर्ववत् । एक गति वाले, दो आगति वाले, प्रत्येकशरीरी और असंख्यात कहे गये हैं ।
[३५] औदारिक त्रस प्राणी किसे कहते हैं ? औदारिक त्रस प्राणी चार प्रकार के हैं, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ।।
[३६] द्वीन्द्रिय जीव क्या हैं ? द्वीन्द्रिय जीव अनेक प्रकार के हैं, पुलाकृमिक यावत् समुद्रलिक्षा । और भी अन्य इसी प्रकार के द्वीन्द्रिय जीव । ये संक्षेप से दो प्रकार के हैं पर्याप्त और अपर्याप्त ।
हे भगवन् ! उन जीवों के कितने शरीर हैं ? गौतम ! तीन, औदारिक, तैजस और कार्मण । हे भगवन् ! उन जीवों के शरीर की अवगाहना कितनी है ? गौतम ! जघन्य से अंगुल का असंख्यातवां भाग और उत्कृष्ट से बारह योजन की अवगाहना है । उन जीवों के सेवार्तसंहनन और हुंडसंस्थान होता है । उनके चार कषाय, चार संज्ञाएँ, तीन लेश्याएँ और दो इन्द्रियाँ होती हैं । उनके तीन समुद्घात होते हैं-वेदना, कषाय और मारणांतिक । ये जीव असंज्ञी हैं । नपुंसकवेद वाले हैं । इनके पांच पर्याप्तियाँ और पांच अपर्याप्तियाँ होती हैं । ये सम्यग्दृष्टि भी होते हैं और मिथ्यादृष्टि भी होते हैं । ये केवल अचक्षुदर्शन वाले होते हैं ।
हे भगवन् ! वे जीव ज्ञानी हैं या अज्ञानी ? गौतम ! ज्ञानी भी हैं, अज्ञानी भी हैं।