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जीवाजीवाभिगम - १/-/१६
हैं । शेष वक्तव्यता सूक्ष्म पृथ्वीकायिकों की तरह, यावत् नियम से छहों दिशा का आहार ग्रहण करते हैं । ये बादर पृथ्वीकायिक जीव तिर्यंच, मनुष्य और देवों से आकर उत्पन्न होते हैं । देवों से आते हैं तो सौधर्म और ईशान से आते हैं । इनकी स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट बावीस हजार वर्ष की है ।
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हे भगवन् ! ये जीव मारणांतिकसमुद्घात से समवहत होकर मरते हैं या असमवहत होकर मरते हैं ? गौतम ! समवहत होकर भी मरते हैं और असमवहत होकर भी । भगवन् ! ये जीव वहाँ से मर कर कहाँ जाते हैं ? कहाँ उत्पन्न होते हैं ? गौतम ! ये तिर्यञ्च्चों में और मनुष्यों में ही उत्पन्न होते हैं । तिर्यंचों और मनुष्यों में भी असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंचों और मनुष्यों में उत्पन्न नहीं होते, इत्यादि । भगवन् ! वे जीव कितनी गति वाले और कितनी आगति वाले हैं ? गौतम ! दो गति वाले और तीन आगति वाले हैं ? हे आयुष्यमन् श्रमण ! वे बादर पृथ्वीकाय के जीव प्रत्येकशरीरी हैं और असंख्यात लोकाकाश प्रमाण हैं । [१७] अप्कायिक क्या हैं ? अप्कायिक जीव दो प्रकार के हैं, सूक्ष्म अपकायिक और बादर अप्कायिक । सूक्ष्म अप्कायिक जीव दो प्रकार के हैं, जैसे कि पर्याप्त और अपर्याप्त । भगवन् ! उन जीवों के कितने शरीर हैं ? गौतम ! तीन, औदारिक, तैजस और कर्म । इस प्रकार सब वक्तव्यता सूक्ष्म पृथ्वीकायिकों की तरह कहना । विशेषता यह है कि संस्थान द्वार में उनका स्तिबुक संस्थान है । शेष सब उसी तरह कहना यावत् वे दो गति वाले, दो आगति वाले हैं, प्रत्येकशरीरी हैं और असंख्यात कहे गये हैं ।
[१८] बादर अप्कायिक का स्वरूप क्या ? बादर अपकायिक अनेक प्रकार के हैं, ओस, हिम यावत् अन्य भी इसी प्रकार के जल रूप । वे संक्षेप से दो प्रकार के हैं - पर्याप्त और अपर्याप्त । इस प्रकार पूर्ववत् कहना । विशेषता यह है कि उनका संस्थान स्तिबुक है। उनमें लेश्याएँ चार पाई जाती हैं, आहार नियम से छहों दिशाओं का, तिर्यंचयोनिक, मनुष्य और देवों से उपपात स्थिति जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट सात हजार वर्ष जानना । शेष बादर पृथ्वीकाय की तरह जानना यावत् वे दो गति वाले, तीन आगति वाले हैं, प्रत्येकशरीरी हैं और असंख्यात कहे गये हैं ।
[१९] वनस्पतिकायिक जीवों का क्या स्वरूप है ? वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक और बादर वनस्पतिकायिक ।
[२०] सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव कैसे हैं ? सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं - पर्याप्त और अपर्याप्त, इत्यादि वर्णन सूक्ष्म पृथ्वीकायियों के समान जानना । विशेषता यह है कि सूक्ष्म वनस्पतिकायिकों का संस्थान अनियत है । वे जीव दो गति में जाने वाले और दो गतियों से आने वाले हैं । वे अप्रत्येकशरीरी (अनन्तकायिक) हैं और अनन्त है । [२१] बादर वनस्पतिकायिक कैसे हैं ? बादर वनस्पतिकायिक दो प्रकार के हैंप्रत्येकशरीरी बदार वनस्पतिकायिक और साधारणशरीर बादर वनस्पतिकायिक ।
[२२] प्रत्येकशरीर बादर वनस्पतिकायिक जीवों का स्वरूप क्या है ? प्रत्येकशरीर बादर वनस्पतिकायिक बारह प्रकार के हैं-जैसे
[२३] वृक्ष, गुच्छ, गुल्म, लता, वल्ली, पर्वग, तृण, वलय, हरित, औषधि, जलरुह