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________________ (२४) भुवनदीपकः। स्थूल इन्दुः सितः षण्ढश्चतुरस्रौ कुजोष्णगू ॥ वर्तुलौ सौभ्यधिषणो दीपों शनिभुजंगमौ ॥३१॥ ___ सं० टी०-अथ देहस्वरूपमाह-स्थूल इति । चन्द्रः स्थूलाङ्गो न कृश इति शेषः । शुक्रः षण्डः नपुंसकादिः, आदिपदेन बालकोऽतिवृद्धो वा, कन्दर्परहित इति शेषः । कुजो भौमः, उष्णगुः सूर्यः, तौ चतुरस्रो चतुष्कोणी नात्युच्चाङ्गौ न लघू इति शेषः । बुधबृहस्पती वर्तुलाकारौ । शानराहू दी! कथयतः इति सर्वत्र विचार्यम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-उस मनुष्यका आकार जाननेके लिये ग्रहोंका आकार कहते हैं । चन्द्रमा मोटे शरीरवाले हैं, शुक्र षंढ ( निर्यि ) अर्थात् दुर्बल है, मंगल और रवि समान शरीरवाले हैं, बुब और बृहस्पति वर्तुल (गोलाकार ) शरीरवाले हैं, शनि और राहु दीर्व (लंबा ) आकारवाले हैं, इसमें जो ग्रह सर्वाधिक बली होकर लग्नको देखे या लग्नमें स्थित हो, उसी ग्रहका आकार उस मनुष्यका कहना ॥ ३१ ॥ रक्तवर्णः कुजः प्रोक्तो धिषणः कनकद्युतिः॥ शुकपिच्छसमः सौम्यो गौरकान्तिरथोष्णगुः३२॥ मन्दाराकस्य पुष्पेण समद्युतिरनुष्णगुः ।। कविरत्यंतधवलः फगी कृष्णः शनिस्तथा ॥३३॥ "Aho Shrut Gyanam"
SR No.009670
Book TitleBhuvandipak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBacchu Sharm
PublisherGangavishnu Shrikrushnadas
Publication Year1940
Total Pages138
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size4 MB
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