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________________ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८] स्याद्वादमञ्जरी २५३ अंशके जाननेको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं कहा जा सकता। इसलिये नयको प्रमाण और अप्रमाण दोनोंसे अलग मानना चाहिए। (२) जितने तरहके वचन हैं, उतने ही नय हो सकते है। इसलिये नयके उत्कृष्ट भेद असंख्यात हो सकते हैं । इसलिये विस्तारसे नयोंका प्ररूपण नहीं किया जा सकता। एकसे लेकर नयोंके असंख्यात भेद किये गये हैं । (क) सामान्यसे शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा नयका एक भेद है (ख ) सामान्य और विशेषकी अपेक्षा द्रव्याथिक ( द्रव्यास्तिक ) और पर्यायाथिक (पर्यायास्तिक ) ये नयके दो भेद हैं । सामान्य और विशेषको छोड़ कर नयका कोई दूसरा विपय नहीं होता, अतएव सम्पूर्ण नैगम आदि नयोंका इन्हीं दो नयोंमें अन्तर्भाव हो जाता है। (ग) संग्रह, व्यवहार, ऋजमूत्र इन तीन अर्थनयोंमें शब्द नयको मिलाकर नयके चार भेद होते हैं। (घ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द नयके भेदसे नय पाँच प्रकारके होते हैं। यहां भाष्यकारने सांप्रत, समभिरूढ़ और एवंभूतको शब्द नयके भेद स्वीकार किये हैं। (च) जिस समय नैगम नय सामान्यको विपय करता है, उस समय वह संग्रह नयमें गभित होता है, और जिस समय विशेषको विपय करता है, उस समय व्यवहारमै गर्भित होता है। अतएव नैगम नयका संग्रह और व्यवहार नयमें अन्तर्भाव करके सिद्धसेन दिवाकरने छह नयोंको माना है। (छ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूतके भेदसे नयके सात भेद होते हैं। यह मान्यता श्वेताम्बर आगम परंपरामें और दिगम्बर ग्रन्थोंमें पायो जाती है। (ज) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र तथा सांप्रत, १. नायं वस्तु न चावस्तु वस्त्वंशः कथ्यते बुधैः । नासमुद्रः समुद्रो वा समुद्रांशो यथैव हि ॥ तन्मात्रस्य समुद्रत्वे शेषांशस्यासमुद्रता। समुद्रबहुता वा स्यात् तत्त्वे क्वास्तु समुद्रवित् ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-६-५,६। २. (अ) सामान्यादेशतस्तावदेक एव नयः स्थितः । स्याद्वादप्रविभक्तार्थविशेषव्यंजनात्मकः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२। (आ) यदि वा शुद्धत्वनयान्नाप्युत्पादो व्ययोऽपि न ध्रौव्यम् । गुणश्च पर्यय इति वा न स्याच्च केवलं सदिति ॥ राजमल्ल-पंचाध्यायी १-२१६ । ३. (अ) दवट्रिओ य पज्जवणओ य सेसा वियप्पा सिं। (द्रव्यास्तिकश्च पर्यायनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः) सन्मतितर्क १-३ । परस्परविविक्तसामान्यविशेषविषयत्वात् द्रव्याथिकपर्यायाथिकावेव नयो, न च तृतीयं प्रकारान्तर मस्ति यद्विषयोऽन्यस्ताभ्यां व्यतिरिक्तो नयः स्यात् । अभयदेव टीका। (आ) संक्षेपाद् द्वौ विशेषेण द्रव्यपर्यायगोचरौ। तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-३। ४. नैगमनयो द्विविधः सामान्यग्राही विशेषग्राही च। तत्र यः सामान्यग्राही स संग्रहेऽन्तर्भूतः, विशेषग्राही तु व्यवहारे । तदेवं संग्रहव्यवहारऋजुसूत्रशब्दादित्रयं चैक इति चत्वारो नयाः । समवायांग टीका। ५. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा नयाः । तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४ । ६. जो सामन्नगाही स नेगमो संगहं गओ अहवा । इयदो ववहारमिओ जो तेण समाणनिद्देसो ॥ विशेषावश्यक भाष्य ३९ । सिद्धसेनीयाः पुनः षडेव नयानभ्युपगतवन्तः । नैगमस्य संग्रहव्यवहारयोरन्तर्भावविवक्षणात् । विशेषावश्यक भाष्य ४५ । ७. से किं तं णए ? सत्तमूलणया पण्णत्ता । तं जहा–णेगमे संगहे ववहारे उज्जुसुए सद्दे समभिरूढे एवंभूए। अनुयोगद्वारसूत्र । तथा स्थानांग सू०.५५२, भगवती सू० ४६९ ।
SR No.009653
Book TitleSyadvada Manjari
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagdishchandra Jain
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1970
Total Pages454
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size193 MB
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