________________
पैसों का व्यवहार
६२
पैसों का व्यवहार
तो उसको उलटा परिणाम आयेगा। ऐसा करके प्रसन्नता होती हो ऐसे भी मनुष्य हैं न? यह तो आपकी मंद कर्म (सरलता) की वजह से ऐसा पछतावा होगा, वरना लोगों को तो पछतावा भी नहीं होता।
अधिक धन हो तो किसी भगवान के या सीमंधर स्वामी के मंदिर में देने योग्य है, दूसरा एक भी स्थान नहीं है और कम पैसे हो तो महात्माओं को भोजन कराने जैसा दूसरा कुछ भी नहीं है। और उससे भी कम होने पर किसी दुखिये को देना। पर वह नक़द नहीं, खानेपीने का सामान आदि पहुँचाना। अब कम पैसे होने पर भी दान कर सकें या नहीं?
[४] ममता-रहितता हमारे पाप में कोई हिस्सेदारी नहीं करता। हम लडके से पूछे कि, 'भाई, हम यह चोरियाँ कर-कर के धन कमाते हैं।'। तब वह कहे, 'आपको कमाना हो तो कमाइये, हमें ऐसा नहीं चाहिए।' पत्नी भी कहे, 'सारी जिन्दगी उलटे-सीधे किए हैं, अब छोड दीजिए न।' तब भी ये मूर्ख नहीं छोडेगा।
किसी को देना सिखा तब से सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। अनंत अवतार से देने को सिखा ही नहीं। जुठन भी देना उसे पसंद नहीं है ऐसा मनुष्य स्वभाव! ग्रहण करना ही उसकी आदत है! जब जानवर में था तब भी ग्रहण करने की ही आदत, देने का नहीं! वह जब से देने को सिखें तब से मोक्ष की ओर मुड़ें।
चेक आया तब से ही समझिए न कि इसे भुनाऊँगा तो पैसे आयेंगे! (पुण्य का फल आने पर सुख मिलेगा।) तब यह तो (पुण्य का) चेक लेकर आये थे और वह आज भुनाया आपने! भुनाया उसमें क्या मेहनत की आपने? इस पर लोग कहें, 'मैं इतना कमाया, मैंने मेहनत की!' अरे! एक चेक भुनाया उसे क्या मेहनत की कहलाये? वह भी फिर चेक जितने का हो उतना ही प्राप्त हो। उससे ज्यादा नहीं मिलेगा न? (पुण्य हो उतना ही मिलेगा, ज्यादा नहीं) यह समझे आप?
मेरा कहना है कि गंभीरता धारण कीजिए, शांति रखिये, क्योंकि जिस पूरण-गलन के लिए लोग दौड़धूप कर रहे हैं वे उनके अवतार व्यर्थ गँवाते हैं और बैंक-बैलेंस में कोई फर्क होनेवाला नहीं है, वह नेचरल (कुदरती) है। नेचरल में क्या करनेवाले हैं? इसलिए हम यह आपका भय भगाते हैं। हम जैसा है वैसा' खुला कर रहे हैं कि जोडना-घटना (कमाना या गँवाना) किसी के हाथ में नहीं है, वह नेचर के हाथों में है। बैंक में जोड़ना वह भी नेचर के हाथ में और बैंक में घटाना यह भी नेचर के हाथ में है। वरना बैंकवाले एक ही खाता रखतें। क्रेडिट अकेला ही रखता, डेबिट रखता ही नहीं।
किसी के साथ विवाद (किच-किच) मत करना। और फिर वैसे लोग कभी कभार ही मिलेंगे! अब उनके साथ झगडकर क्या प्राप्त होनेवाला है? (हम) एक बार कह दें कि 'भगवान को तो याद कर' तब वह कहे, 'भगवान कौन भला?' ऐसे शब्द निकलें तो समझ लें कि यह विद्रोही है।
लाचारी जैसा दूसरा पाप नहीं है ! लाचारी नहीं होनी चाहिए। नौकरी नहीं मिलती हो तो लाचारी, घाटा हुआ तब भी लाचारी, इन्कमटैक्स आफ़िसर धमकाता हो तब भी लाचारी। अरे, लाचारी क्यों करता है। ज्यादा से ज्यादा वह क्या करेगा? पैसे ले जायेगा, घर ले जायेगा, और क्या ले लेगा? तब लाचारी किसके लिए? लाचारी तो भगवान का अपमान कहलाये। हम लाचारी करें तो भीतर भगवान का भयंकर अपमान होता है। मगर क्या करे भगवान?
व्यावहारिक कानून क्या है! शेयरबाज़ार में घाटा हआ हो तो किराना बाजार से भरपाई मत करना। शेयरबाजार से ही भरपाई करना।
बहुत सारे मच्छर होंगे तब भी सारी रात सोने नहीं देंगे और दो होंगे तब भी सारी रात सोने नहीं देगे। तो हम कहें कि 'हे मच्छरमय दुनिया! दो ही सोने नहीं देते तो सारे एक साथ आओ न!' ये मुनाफाघाटा, मच्छर ही कहलाये। मच्छर तो आते ही रहेंगे। हम उन्हें उडाते रहें और सो जायें।