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________________ २७४ २७७ २८५ [२७] निखालिस निखालिसता निर्भय बनाए २७० [२८] मुक्त हास्य जितनी सरलता उतना मुक्त हास्य२१३ मुक्त हास्य, मुक्त पुरुष का २१४ [२९] चिंता : समता भूतकाल, अभी कौन याद निराकुलता! करता है? २१६ समता, वहाँ राग-द्वेष नहीं २२० परसत्ता अधिकार, चिंता को समभाव-समता, फर्क क्या? २२१ जन्म दे २१७ 'समभाव से निकाल' नक्की होने चिंता, सफलता का अवरोधक २१८ पर हल २२१ भ्रांति में शांति रहती है? २१९ समताभाव : ज्ञाता-दृष्टाभाव २२२ 'ज्ञानी' के सानिध्य में कैसी तृष्णा, तृप्ति और संतोष २२२ [३०] संयम परिणाम यथार्थ संयम किसे कहते हैं? २२४ संयम ही पुरुषार्थ २२६ संयम से ही आत्मशक्ति प्रकट २२५ लोभ के सामने संयम, किस तरह?२२७ संयम के स्कोप का लाभ उठाओ!२२५ [३१] इच्छापूर्ति का नियम कुदरत, कितनी नियमबद्ध २२८ इच्छा, उसके प्रत्याख्यान २३१ इच्छा, वहाँ अंतराय [३२] टी.वी. की आदतें ...फिर महत्व किसका? २३२ टाइम पास या जीवन व्यर्थ गँवाया?२३३ [३३] लोभ की अटकण परसत्ता, वहाँ लोभ क्या? २३४ तृप्ति, आत्मज्ञान के बिना नहीं है२३४ लोभ से प्राप्ति या नुकसान? २३४ लोभी - हरएक बात का लोभ २३५ [३४] लगाम छोड़ दो तो कर्त्तापद का अध्यास छूटे २३६ डिस्चार्ज स्वरूपों को, निर्दोष देखें२३९ 'ज्ञानी' का कैसा प्रयोग! २३७ ड्रामेटिक में कर्त्तापद नहीं २४० 'चार्ज-डिस्चार्ज' का साइन्स २३८ संयम, चरम दशा का २४१ [३५] कर्म की थियरी व्यवहार में, कर्म क्या? धर्म क्या?२४२ कर्म छेदन की सत्ता जगत् ने कर्ता थियरी ही जानी २४२ प्रभुस्मरण से हेल्प कर्म का कर्ता कौन? २४३ भगवान को भी कर्मबंधन २६१ वह अहंकार कौन निकाले? २४५ 'ज्ञानी पुरुष' के दिव्य कर्म २६२ अज्ञान, वहाँ अविरत कर्मबंधन। २४५ कर्म का स्वरूप ज्ञान, वहाँ कर्मबंधन ही नहीं २४६ कर्म और 'व्यवस्थित' २६५ प्रायश्चित से हल्के कर्म बंधते हैं २४६ भावबीज के सामने सावधान २६३ कर्मबंधन, मनुष्यगति में ही २४७ कर्म लय की प्रतीति २६४ कर्म, कितने ही जन्मों की सिलक २४८ पुद्गल के कर्मबंधन किस तरह?२६४ हिसाब, किस तरह चुकाया जाए? २४९ गाढ़ कर्मों से हल २६५ आश्रव, निर्जरा : संवर, बंध २५० गाढ़ कर्म अर्थात् क्या? २६६ शुभाशुभ का थर्मामीटर २५२ 'निष्काम कर्म' किस तरह किए स्थूल कर्म - सूक्ष्म कर्म २५३ जाते हैं? २६७ बुरे कर्मों से छुटकारा २५९ आत्मा, अनादि से शुद्ध ही! २६८ कर्म, पाप-पुण्य के २५९ करना, करवाना और अनुमोदन निंदा का कर्मबंधन २६० करना २६८ [३६] भाव, भाव्य और भावक भावक ही भाव का कर्ता २७१ बदलते रहते हैं भाव में एकाकार हो, तो भाव्य २७१ भावों में एकाकार नहीं हों तो भावक का स्वरूप २७२ मुक्ति २७६ भावक का आधार, संसारीज्ञान २७२ व्यापक-व्याप्य भावक, समसरण के अनुसार प्रमेय-प्रमाता [३७] क्रियाशक्ति : भावशक्ति क्रियाशक्ति, परसत्ता अधीन २७९ भाव का फॉर्म भाव के अनुसार फल आता है। २८० भाव ही मुख्य एविडेन्स भाव-इच्छा, फर्क क्या? २८० द्रव्य-भाव २८९ संयोगों का मूल, भाव २८१ भावमन : प्रतिष्ठित आत्मा २९१ भाव अलग - विचार अलग २८१ प्रतिभाव क़ीमत, भाव की ही २८२ स्वभाव-स्वक्षेत्र : परभाव-परक्षेत्र २९४ प्रतिपक्षी भाव २८४ [३८] 'स्व' में ही स्वस्थता अवस्था में अस्वस्थ २९५ अवस्था : पर्याय [३९] ज्ञान का स्वरूप : काल का स्वरूप स्वरूपज्ञान का अधिकारी २९९ कालद्रव्य वर्तमान में बरतें, ज्ञानी ३०० [४०] वाणी का स्वरूप वाणी आत्मा का गुण नहीं है ३०३ वाणी, वह अहंकार का स्वरूप ३१७ स्याद्वाद वाणी ३०४ वीतराग वाणी के बिना, नहीं उपदेश का अधिकारी ३०५ कोई उपाय ३१८ हृदयस्पर्शी सरस्वती ३०७ वाणी का रिकॉर्डिंग वचनबल, ज्ञानी के ३०८ वाणी का 'चार्ज पोइन्ट' मौन तपोबल ३०९ जहाँ प्रकट दीपक, वहीं काम जीवंत टेपरिकॉर्ड, कैसी जिम्मेदारी!३११ होता है २९३ २६१ २६१ ३१९ २६५ ५३ ५४
SR No.009576
Book TitleAptavani 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDada Bhagwan
PublisherMahavideh Foundation
Publication Year2010
Total Pages191
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Akram Vigyan
File Size50 KB
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