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________________ एडजस्ट एवरीव्हेर जगह कैसे पहुँच पायें ? एडजस्ट एवरीव्हेर वाइफने भोजन पकाया हो उसमें भूल निकाले वह ब्लन्डर्स (बडी भूल) नहीं करते ऐसा । मानो खुदसे गलती होती ही नहीं हो ऐसे बात करता है । हाउ टु एडजस्ट ? (अनुकूल कैसे बनें ?) एडजस्टमेन्ट लेनाच चाहिए । जिसके साथ आजीवन गुजारा करना है उसके साथ एडजस्टमेन्ट नहीं लेना चाहिए क्या ? हमसे किसीको दुःख पहुँचे वह भगवान महावीरका धर्म कैसे कहलायेगा ? और घरके मनुष्यको तो क़तई द:ख नहीं होना चाहिए। दादाश्री : दोनोके साथ ले सकते है । अरे सात जगह पर लेना हो तो भी ले सकते हैं । एक पूछे, "मेरा क्या किया ?" तब कहे, "हाँ, साहब आपके कहने के मताबिक करेंगे ।" दुसरेको भी वही जबाब, "आप कहेंगे वैसा करेंगे।""व्यवस्थित" के बाहर कुछ होने वाला नहीं है। इसलिए किसी भीतरह झगड़ा नहीं होने दें । प्रमुख बात “एडजस्टमेन्ट" है । "हाँ" से मुक्ति है । हमने "हा" कह फिरभी "व्यवस्थित" के बाहर कुछ होनेवाला है । लेकिन "नहीं" कहा तो महा उपाधि ! घरमें पति-पत्नी दोनों निश्चय करें कि हमें 'एडजस्ट' होना हैं तो दोनोकी समस्या हल हो जाये । वह ज्यादा खींचे तो हमारे एडजस्ट हो जाने पर हल निकल आयेगा । एक आदमीका हाथ दु:खता था, पर वह दूसरोंको नहीं बताता था और दूसरे हाथसे हाथ मिलाकर 'एडजस्ट' किया । इस प्रकार 'एडजस्ट' हो जायें तो हल निकल आये । यह "एडजस्ट एवरीव्हेर" नहीं होने पर पागलकी तरह सामनेवालोंको छेडते रहोगे, इसी वजहसे पागल हुए हैं । इस कुत्तेको एकबार छेडें दोबार, तीनबार छेडें वहाँ तक वह हमारी आबरू रखेगा पर फिर बार बार छेडने पर वही भी काट लेगा । वह भी समझ जायेगा कि यह रोजाना छेडता है इसलिए नालायक है, नंगा है । यह समझने जैसा है । जरासीभी झंझट ही करनेकी नहीं है, "एडजस्ट एवरीव्हेर" । जिसे 'एडजस्ट' होनेकी कला आ गई, उह दुनियासे मोक्षकी और मुड गया ? 'एडज्ट' हुआ उसका नाम ज्ञान । जो 'एडजस्टमेन्ट' सिख गया वह पार लग गया । भुगतना है वहतो भुगतना ही पड़ेगा लेकिन 'एडजस्टमेन्ट' आ गया उसे अड़चन नहीं होगी. हिसाब चुकता हो जायेगा । जब लुटेरे मिल जायें उनके साथ डिसएडजस्ट होने पर वे मारेंगो । उसके बजाय हम तय करें कि वहाँ 'एडजस्ट' होकर काम लेना है । फिर उनसे पूछे कि, "भैया, तेरी क्या इच्छा है ? हम तो यात्रा पर निकले है।" उनको 'एडजस्ट' हो जायें। प्रकृतिका सायन्स जानिए ! (घर एक बगीचा) एक भाई मुझसे कहने लगा कि, "दादा, मेरी बीबी घरमें ऐसा करती है और वैसा करती है ।" तब मैंने उसे कहा कि बहने से पूछेगे तो वह क्या कहेगी कि मेरा पति ऐसा है बिना अक्लका । अब इसमें आप अपना अकेलेका न्याय क्यों खोजते है ? तब उस भाईने कहा कि. "मेरा तो घर ही बिगड़ गया है, बच्चे बिगड़ गये है, बीवी बिगड गई है ।" मैंने कहा, "कुछ बिगड़ा नहीं है ।" आपको वह देखना नहीं आता है । आपको अपना घर देखते आना चाहिए, प्रत्येककी प्रकृति पहचान होनी चाहिए । ऐसा है न, घरमें एडजस्टमेन्ट नहीं होनेकी वजह क्या है ? परिवार में ज्यादा सदस्य होनेसे सबके साथ मेल नहीं रहता । बातका बतंगड हो जाता है फिर । वह किसलिए? मनुष्योंका स्वभाव एक सा नहीं होता है । युगके अनुसार स्वभाव हो जाता है । सत्यगमें आपसी मेल होता है, घरमें सौ सदस्य होने पर भी दादाजी कुछ कहें तो उन्हें इतनी बड़ी बड़ी गालियाँ सुनायेंगे, बाप कुछ कहेगा तो बापका भी वही हाल होगा । ___अब मनुष्य तो मनुष्य ही है लेकिन आपको पहचानना नहीं आता है । घरमें पचास मनुष्य हो पर हमें पहचान नहीं हुई इसलिए बखेडा खड़ा होता रहेता है । उन्हें पहचानना तो चाहिए न । घरमें एक व्यक्ति किचकिच किया करे तो वह उसका स्वभाव ही हा । इसलिए हमें एक बार समझ लेना चाहिए कि यह ऐसा है। आप पहचान सकते हैं कि यह ऐसा
SR No.009572
Book TitleAdjust Everywhere
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDada Bhagwan
PublisherMahavideh Foundation
Publication Year
Total Pages18
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Akram Vigyan
File Size291 KB
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