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________________ १४. धुवसिद्धी तित्थयरो चउणाणजुदो करेइ तवयरणं ।। ६० ।। अर्थ- जिनकी मोक्ष प्राप्ति निश्चित है ऐसे चार ज्ञान के धारी तीर्थंकर भी तप करते हैं। ११. जहाबलं जोई अप्पा दुक्खेहिं भावए ।। ६२ । । अर्थ-योगी को यथाशक्ति तप, क्लेश आदि दुःखों के द्वारा आत्मा को भाना चाहिए । २०. झायव्वो णिय अप्पा णाऊणं गुरुपसाएण ।। ६३ ।। अर्थ- गुरु के प्रसाद से निज आत्मा को जानकर उसका ध्यान करना चाहिए। २१. ताम ण णज्जइ अप्पा विसएसु णरो पवट्टए जाम ।। ६६ ।। अर्थ-जब तक मनुष्य विषयों में प्रवर्तता है तब तक आत्मा को नहीं जानता है। २२. विसएविरत्तचित्तो जोई जाणेइ अप्पाणं ।। ६६ ।। अर्थ-विषयों से विरक्तचित्त योगी ही आत्मा को जानता है । २३. हिंडंति चाउरंगं विसएसु विमोहिया मूढा । । ६७ ।। अर्थ-विषयों में विमोहित मूढ़ प्राणी चतुर्गति रूप संसार में भ्रमण करते हैं। २४. सो मूढो अण्णाणी आदसहावस्स विवरीदो । । ६१ । । अर्थ - आत्मस्वभाव से विपरीत जीव मूढ़ है, अज्ञानी है। २५. होदि धुवं णिव्वाणं विसएसु विरत्तचित्ताणं ।। ७० ।। अर्थ- जिनका चित्त विषयों से विरक्त है उनका निश्चित ही निर्वाण होता है। २६. संसारसुहे सुरदो ण हु कालो भणइ झाणस्स । । ७४ ।। अर्थ-संसार सुख में सुरत जीव कहता है कि यह काल ध्यान का नहीं है । २७. उद्धद्धमज्झलोए केई मज्झं ण अहयमेगागी । । ४१ ।। अर्थ-उर्ध्व, मध्य एवं अधोलोक में कोई मेरा नहीं है, मैं एकाकी हूँ। ६-१०५
SR No.009483
Book TitleAstapahud
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaychand Chhabda, Kundalata Jain, Abha Jain
PublisherShailendra Piyushi Jain
Publication Year
Total Pages638
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size151 MB
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