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________________ भगवतीसूत्रे ५० से पुरओ कडे चिट्ठ' पृथिवीकायिकायुष्कं तस्य पुरतः कृतं तिष्ठति हे भदन्त ! यो सुरक्कुमारः कतरमायुष्कमनुभवतीति प्रश्नः एतादृशोऽसुरकुमारः असुरकुमारायुकं प्रतिसंवेदयन् पृथिवीकायिका युष्कमुदयाभिमुखं करोतीत्युत्तरम् । 'एवं यो यत्र भव्य उत्पतुम् ' तस्स तं पुरओ कडे चिट्ठ' तस्य तत् - आयुः पुरतः कृतं तिष्ठति, एवमेव - असुरकुमार। दिवदेव यो जीवो यत्र भवविशेषे उत्पत्ति योग्यो भवति स तस्य भवविशेषस्य तत् आयुष्कस् उदयाभिमुखं करोतीत्यर्थः । ' जत्थ ठिओ तं पडिसंवेदेइ' यत्र भवविशेषे यो जीवः स्थितः स जीवः तद्-भवसम्बन्ध्या युवक प्रतिसंवेदयति अनुभवतीत्यर्थः यादृशभवात् मृत्वाऽनन्तरं यत्र भवविशेषे गमनयोग्यः तादृशमत्रस्थमायुष्कमनुभवन्नेव आगामि मवसंवन्ध्यायुष्कमुदयाभिमुखं करोतीति परमार्थः । एवं जाव वेमाणिए' एवं यावद् वैमानिकः वैमानिकपर्यन्तम् होने के योग्य हैं। वह असुरकुमार की आयुका तो अनुभवन करता है एवं 'पुढची काइयाउए से पुरओ कडे चिट्ठ' जहाँ उसे उत्पन्न होना है ऐसे पृथिवीकायिक की आयु को उदद्याभिमुख करता है । ' एवं जो जहिं भविओ उववज्जिन्तए तस्स ते पुरओ कडे चिट्ठह' इस असुरकुमारादि के प्रकार ही जो जीव जो भवविशेष में उत्पत्ति योग्य होता है वह उस भवविशेष की आयु को उदद्यामिमुख करता है, और ' जत्थ ठिओ तं पडिसंवेदेइ' जहाँ वह वर्तमान में स्थित है उस आयु का अनुभव करता है । जिस भव से सरकर अनन्तर भवमें उत्पन्न होता है, वह जीव उस आगामी अवसम्बन्धी आयु को उदद्याभिमुख करता है । और वर्तमान में जिस पर्याय में वह मौजूद है उस भवकी आयु का वह प्रतिसंवेदन ( अनुभव ) करता है । ' एवं जाव माणिए' रोना आयुष्या तो अनुभव रे छे, भने “ पुढवीकाइयाउए से पुरओ कडे चिट्ठर" तेने यां उत्पन्न थवानु छे, तेवा पृथ्वी आयिोना मायुष्यने उध्यामिभु रे छे, "एवं जो जहि भविओ उजवज्जित्तए तर ते पुरओ कडे चिट्ठइ" मा असुरसुभारोना अथन अभाबे ने व्यक्ति थे अव विशेषभां ઉત્પન્ન થવા ચાગ્ય અને છે. તે પ્રાણી તે ભવ વિશેષના આયુને ઉદયાભિમુખ पुरे छे. " जत्थ ठिओ तं पडिसवेदेइ" नयां ते वर्तमानमां होय ते આયુને અનુભવ કરે છે. જે ભત્રથી મરીને ખીજા ભવમાં જ જે જીવ ઉત્પન્ન થાય છે. તે જીત્ર તે આગામી ભવ સમધી આયુને ઉદયાભિમુખ કરે છે, અને વમાનમાં જે પર્યાયમાં તે મેાજુદ છે. તે ભવની आयुना ते अतिस वेहन-अनुभव रे छे. "एवं जाव वेमाणिए" मान तनुं
SR No.009323
Book TitleBhagwati Sutra Part 13
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages984
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size63 MB
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