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________________ ३४० - भगवतीमो गडं, अणुटिं, नवकोडीपरिसुद्धं, दसदोस विप्पमुक्कं' तत्र-असंकल्पितम साधवे दातुं कृतसंकल्पवर्जितम् अनातिम्, न विद्यते आहृतम्-आहानम् आमन्त्रणं 'नित्यं मद्गृहे पोपणमात्रमन्नं ग्रहीतव्यम् इत्येवंरूपं यस्य तादृशम्, अक्रीतकृतम् क्रयेण साध्यर्थ न कृतम्, अनुद्दिष्टं साघूद्देश्यरहितम् दायकेन साधुमुद्दिश्य न कृतमित्यर्थः नवकोटिपरिशुद्धम्, नव कोटयो विभागाः, तैः परिशुद्धम्, ताश्च नव कोट्या-न हन्ति १, न घातयति २, न घ्नन्तमनुमन्यते ३, न पचति ४, न पाचयति ५, न पचन्तमनुमन्यते ६, न क्रोणाति ७, न क्रापयति ८, न क्रीणअणुदिडं, नकोडिपरिसुद्धं, दसदोसविप्पमुक्क' साधु महाराजकोदेनेका जिसमें दाताका संकल्प भी नहीं होता है, आप नित्य मेरे घर से पोषणमात्र आहार ले जाया करें। इस प्रकारसे जो आमंत्रित कर दाता द्वारा नहीं दिया गया होता है, 'अक्रीतकृत' मोललेकर जो साधुके लिये नहीं किया जाता है, 'अनुद्दिष्ट' साधुको उदिश्य करके दाताने जिसे नहीं बनाया होता है, 'नवकोटिपरिशुद्धम् नवकोटियों से जो परिशुद्ध होता है कोटिशब्दका अर्थविभाग है वे नौ विभाग इस प्रकारले हैं 'नहन्ति'१ न स्वयं हनन करता है 'न घातयति'२ न दूसरोंसे हनन करवाता है, 'न घ्नन्तमनुमन्यते'३ और न हनन करनेवालेकी अनुमोदन करता है 'न पचति'४ न स्वयं पकाता है 'न पाचयति५ न दूसरोंसे पकवाता है 'न पचन्तमनुमन्यते न पकाते हुएकी अनुमोदना करता है 'क्रीणाति ७ नस्वयं खरीदता है 'नक्रापअणुदित, नवकोडिपरिसुद्धं दसदोसविप्पमक, '२५ मा २ साधुने वडारावीश' એ જેમાં દાતાને સંકલ્પ ન હય, “આપ મારે ત્યાં દરરોજ પધારીને આપને જરૂરી આહાર–પાણી વહેરી જશે’ એ પ્રકારનું આમંત્રણ આપીને જે આહાર દાતા દ્વારા साधुने पासवपामा माव्या हाती नथी, 'अक्रीतकत' भृत्य छन ने साधुने मारे તૈયાર કરાવ્યું ન હોય, અનુદિષ્ટ સાધને ઉદિશ્ય કરીને જે આહાર દાતાએ બનાવ્યો હોતું નથી, જે નવ પ્રકારે પરિશુદ્ધ હોય છે, અને દસ દેષથી રહિત હોય છે, એવાજ આહારને સાધુઓ પિતાના ઉપયોગમાં લે છે. “નવોટિ પરિશુદ્ધ આહાર કેને કહે છે તે સમજાવવામાં આવે છે– (१) 'न हन्ति' पाते तो नथा, (२) 'ना घातयति' भी पासे शावता नथी, (3) 'न घ्नन्तमनमन्यते' ना२नी मनुभाहना ४२तो नथी, (४) 'न पचयति' पात पिता नथी, (५) 'न पाचयति' भीत पासे २ धावत। नथी, (६) 'नपचन्तमनुमन्यते' धना२नी मनुभाहना ४२ नथी. (७) 'न क्रीणाति' बोते मत नथी,
SR No.009315
Book TitleBhagwati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages880
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size50 MB
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