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________________ प्रमैयचन्द्रिका टीका श० ५ उ०१ सू० २ रात्रिंदिवसस्वरूपनिरूपणम् दिवसो भवति तदा 'तेरसमुहुत्ताराईभवई' त्रयोदशमुहूर्ता रात्रिर्भवति, सर्वाभ्यन्तर मण्डलाव्यहितपूर्ववति १८२ द्वयशीत्यधिकशततममण्डलादारभ्य प्रतिमण्डलं विलोमतया वहिः परावर्तमानः सूर्यो यदा एकत्रिंशत्तममण्डलार्धे संचरति तदो प्रतिमण्डलमेकैकोक्तपलचतुष्टयहासक्रमे गैसमुहूतहासात् सतदशमुहूर्न दिवसमान भवति, रात्रिमानेचैकसुहूर्तापचयात् त्रयोदशाहूतं रात्रिमानं सम्पद्यते , इत्याशयः। एवं 'सत्तरसमुहूत्ताणंतरे दिवसे साइरेगा तेइरसमुहुत्ताराई ' सप्तदशमुहूर्तानन्तरो .दिवसः सातिरेका त्रयोदशमुहूर्ता रात्रिभवति, एतावता उपर्युक्तद्वयशीत्यधिकशततम १८२ मण्डलादारभ्य यदा सूर्यों विलोमतया बहिः प्रतिमण्डलं परावर्तमानो जब सत्तरह मुहूर्त का दिन होता है तब (तेरस मुहुत्ता राई भवइ) तेरह मुहूर्त की रात्रि होती है तात्पर्य यह है कि जब सूर्य सर्वाभ्यन्तर मण्डल के अव्यवहित पूर्ववर्ती १८२ एकसो बयासो वें मण्डल से लेकर प्रत्येक मंडल पर विलोमरूप से चलता २ इकतीस वें मण्डलार्थ में-मं. डलके आधे भाग में-पहुंचता है, तब प्रतिमण्डल के एक २ चारपलरूप समय के हास के क्रम से, एक मुहूर्त रूप समय का हास हो जाता है. इस कारणं १७ सत्तरहमुहूर्त का दिन होता है, और रात्रिमान में एक मुहूर्त का समय बढ जात है-इसलिये रात्रि का मान बारह मुहूत की जगह तेरह मुहूत्त का हो जाता है । इसी तरह (सत्तरसमुहुत्ताणंतरे दिवसे साईरेगा तेरसमुहत्ताराई) जब सत्तरह मुहूर्त से कुछ कम दिनमान होता है तब रात्रिमान कुछ अधिक तेरह मुहूर्त का हो जाता है, तात्पर्य कहने का यह है कि जब सूर्य पूर्वोक्त १८२ एकसोबयासी वें मंडल से लगा. रसमुहुत्ते दिवसे भवइ, तेरसमुहुत्ता राई भवइ" न्यारे १७ सत्तर भुइतनी हिवस થાય છે, ત્યારે ૧૩ તેર મુહુર્તની રાત્રિ થાય છે. તાત્પર્ય એ છે કે જ્યારે સૂર્ય સર્વાભ્યન્તર મંડળના ૧૮૨ મા મંડળથી માંડીને પ્રત્યેક મંડળ પર વિલેમરૂ ૫ (બુર્જમરૂપે)બહાર સંચાર કરતે કરતો ૩૧એકત્રીસમાં મંડળાર્ધમાં (મંટળના અધ ભાગમાં) પહોંચે છે. ત્યારે પ્રત્યેક મંડળે ચાર, ચાર પળપ્રમાણુ સમય ઘટતા ઘટતા એક મુહૂર્ત પ્રમાણ સમય ઘટી જઈને, સત્તર મુહુર્તાને દિવસ થાય છે, અને રાત્રિના કાળ પ્રમાણમાં એક મુહૂતને કાળ વધી જવાથી તેર મુહૂતની रात्रि थाय छे. मे प्रभारी “ सत्तरसमुहुत्ताणतरे दिवसे साईरेगा तेरस-मुहुत्ता राई "न्यारे सत्तर भुट्टतथा सङि माछ। प्रमाण वाणी हिवस थाय छ, ત્યારે ૧૩ મુદતથી સહેજ વધુ પ્રમાણવાળી રાત્રિ થાય છે. કહેવાનું તાત્પર્ય એ છે કે જ્યારે સૂર્ય પૂર્વોક્ત ૧૮૨માં મંડળથી સતત વિલેમરૂપે-યુદ્ધમે
SR No.009314
Book TitleBhagwati Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year
Total Pages1151
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size74 MB
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