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________________ स्थानाङ्गसूत्रे २७४ छाया-प्रव्रज्या शिक्षाव्रतानि अर्थग्रहणं चानियतो वासः । निष्पत्तिश्च विहारः, सामाचारी स्थितिश्चैव ॥१॥ ___ इत्यादिरूपा स्थविरकल्पस्थिति रिति ३। इहच मूत्रद्वयेऽयं क्रमोपन्यासः सामायिके सति छेदोपस्थापनीयं भवति तस्मिंश्च सति परिकारविशुद्धिकभेदरूप निर्वि. शमानकं, तदनन्तरं निर्विष्टकायिकं, तत्पश्चाग्जिनकल्पः स्थविरकल्पो वा भवतीति सामायिकाल्पस्थित्यादीनां क्रम इति ।। सू० ७३ ।। पूर्वोक्तकल्पस्थितीनां व्यतिक्रमविपरीतविधायका नारकादि शरीरिणो भवन्तीति नारकादिशरीरनिरूपणमाह मूलम्--नेरइयाणं तओ सरीरगा पण्णत्ता, तं जहा-वेउविए तेयए, कम्मए । असुरकुमाराणं तओ सरीरगा पण्णत्ता, तं जहा-एवं चेव । एवं लव्वेसिं देवाणं । पुढवीकाइयाणं तओ सरीरगा पण्णत्ता, तं जहा-ओरालिए तेयए कम्मए । एवं वाउकाइयावज्जाणं जाव चउरिदियाणं ॥ सू० ७४ ॥ कल्पस्थिति है इसका स्वरूप इस प्रकार है-"पवज्जा सिकवावय" इत्यादि, इत्यादिरूप यह स्थविरकल्पस्थिति है ३ यहां दो सत्रों में यह क्रमोपन्यास है-सामायिक के होने पर छेदोपस्थापनीय होता है, छेदोपस्थापनीय के होने पर परिहार विशुद्धिक का भेदरूप निर्विशमानक होता है, बाद में-निविष्टकायिक होता है इसके बाद जिनकल्प होता है, अथवा स्थविरकल्प होता है, इस प्रकार से यह सामायिक कल्पस्थिति आदिकों का क्रम है। मू०७३। इन पूर्वोक्त कल्पस्थितियों का व्यतिक्रम विपरीत करनेवाले नारकादि शरीरबाले होते हैं, अतः अब सूत्रकोर नारकादि शरीर का निरूपण करते हैं" पवजा सिक्खावय" त्यादि ३५ 21 स्थविर ४६५स्थिति राय छ महा બે સૂત્રામાં કેમપન્યાસ ( ઉલટ કમ) છે–સામાયિકના ભાવમાં છેદેપસ્થાપનીય થાય છે, છેદેપસ્થાપનીયના સદુભાવમાં પરિહાર વિશુદ્ધિક ભેદરૂપ નિર્વિશમાન થાય છે, ત્યારબાદ નિર્વિષ્ટકાયિક થાય છે, ત્યારબાદ જિનક૫ થાય છે, અથવા સ્થવિરક૯૫ થાય છે આ પ્રમાણે આ સામાયિક સ્થિતિ माहिना भ छ. ॥ सू. ७३ ॥ આ પૂર્વેત કાસ્થિતિના વ્યતિક્રમ (વિપરીતતા) કરનારા નારકાદિ શરીરવાળા હોય છે તેથી હવે સૂત્રકાર નારકાદિના શરીરનું નિરૂપણ કરે છે. " तओ सरीरगा पण्णत्ता" त्यादि
SR No.009308
Book TitleSthanang Sutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1964
Total Pages822
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size47 MB
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