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________________ [ ८२] प्रतिष्ठा करानी चाहिये, चतुर्विध संघको शिवप्राप्तिके लिये यथायोग्य दान देने चाहिये और नगरों तथा प्रामोंक जिनमन्दिरोंमें मनोहर छत्र, चंवर, घंटे तथा ध्वजादिक स्थापित करने चाहिये। राजन् ! यह इस व्रतके उद्यापनको उत्कृष्ट विधि आगममें शिवमुखके देने वाली मानो गई है."यथाशक्ति वतका उद्यापन करनाही चाहिये । यदि दारिदके योगसे ऐसी भो उद्यापनकी शक्ति न हो तो फिर कायसे दुगुना व्रत करना चाहिये, उससे उद्यापनके समान हो फलको प्राप्ति होती है: पूर्णे याते हि व्रतस्य प्रतिष्ठा श्रीजिनेशिना । करणीया समोदेन व्रतस्य फलसिद्धये ॥४४॥ चतुर्विधाय संघाय, यथायोग्यानि मोदतः । सन्देयानि शिवाप्त्यर्थ दानानि व्रतिभिः खलु ॥४५॥ परेष नगरेषु वै स्थापनीया मनोहराः । छत्राश्च चामराः घंटाः ध्वजाद्याः जिनसद्मसु ॥४६॥ उत्कृष्टोऽयं विधिप ! शिवशर्मप्रदायकः । व्रतस्योद्यापनस्यास्य स्यात्खल आगमे मतः ॥४७॥ यथाशक्त्या करणीयो व्रतस्योद्यापनो नृप ! एतादृश्यपि नास्त्येव शक्तिदारिद्रयोगतः ॥४६॥ अतो हि कायतो भव्याः कुरुवं द्विगुणमिदं । तत्समं हि फलाप्तिश्च भवतामपि संभवेत् ॥५०॥ वस्तुतः उद्यापनादिकी ये सब बातें भट्टारकीय शासन से सम्बन्ध रखती है । भट्टारकोंको उद्यापनोंसे बहुत कुछ प्राप्ति
SR No.009241
Book TitleSuryapraksh Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir
Publication Year1934
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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