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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir निर्मल मन आज मानव स्वयं अपना मूल्य बदल रहा है । वह मानवता से नहीं, साधनसामग्री से ही किसी मानव का मूल्यांकन करता है। अकबर इलाहाबादी ने कहा था : नहीं कुछ इसकी पुरसिश उल्फते अल्लाह कितनी है सभी यह पूछते है, आपकी तनख्वाह कितनी है ।। ईश्वर में आपकी भक्ति कितनी है ? यह कोई नहीं पूछता । इसक बदले सब यहीं पूछते हैं कि आपका वेतन क्या है ? वेतन क आधार पर ही आपका सम्मान किया जाता है । __ लोग भूल जाते हैं कि साधन सामग्री का मालिक मनुष्य है; इसलिए मनुष्य का ही महत्त्व अधिक है । वह वस्तु के आसपास न घुमकर वस्तुओं को ही अपने आसपास घुमानेवाला केन्द्र है । __ आधुनिक युग में मशीनें जितनी महँगी हैं, मनुष्य उतने ही सस्ते हैं । साधनसामग्री ही सर्वत्रा सब के सिर चढ़कर बोलती है । मनुष्य साधनों (मशीनों) का मालिक न रहकर गुलाम बन गया है । जो लोग कार में बैठकर यहाँ व्याख्यान सुनने आते हैं, उनकी कार कभी बेकार हो जाय तो उस दिन व्याख्यान की भी छुट्टी हो जाय । व्याख्यान लक्ष्य है, कार नहीं । कार तो केवल साधन है । हृदय में रही हई शास्त्रा श्रवण की भावना ही श्रावक की शोभा बढ़ाती है, उसकी कार नहीं । यह बात वही समझ सकता है, जिसके जीवन में धर्म पुरुषार्थ हो । वह व्यक्ति यशाशक्ति हिंसा से दूर रहता है । अहिंसा को वह परम धर्म मानता है । मांसाहार के विषय में तो धार्मिक व्यक्ति कभी विचार तक नहीं कर सकता ।। फिर भी हैं कुछ लोग, जो धर्मस्थानों में जाते हैं -- व्याख्यान भी सुनते हैं - सामायिक आदि क्रियाएँ भी करते हैं; परन्तु गुपचुप मांसाहार कर लेते हैं । एसे लोगों में से कुछ फैशन के रुपमें मांसाहारियों से मित्रता निभाने क लिए । कई लोग इस भ्रम क शिकार होकर मांसभोजी बन जाते हैं कि उसक शरीर में शक्ति बढेगी - आयु लम्बी होगी; परन्तु वे भूल जाते हैं कि शाकाहारी नियमित भोजन से सौ वर्षों तक आसानी से जिया जा सकता है। मांसाहारी का जीवन छोटा और क्रूर होने से नीरस होता है । १४ For Private And Personal Use Only
SR No.008731
Book TitlePratibodh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmasagarsuri
PublisherArunoday Foundation
Publication Year1993
Total Pages122
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Discourse
File Size6 MB
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