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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir मयणासुन्दरी उमयिनी नरेश प्रजापाल ने भरी सभा में अपनी दोनों पत्रियों से एक प्रश्न किया :- “सुख पिता से मिलता है या पुण्य से ?" एक पुत्री सुरसुन्दरी ने कहा :- "पिता से" दूसरी मैनासुन्दरी ने कहा .- “पण्य से ।" प्रसन्न पिता ने सुरसुन्दरी का विवाह शंखपुरनरश अरिदमन से कर दिया; किन्तु मयणासन्दरी के उत्तर से अप्रसन्न होकर उसका विवाह उबर गणा नामक एक कोढी से किया । । नवपद की विधिपूर्वक आराधना से कोढ मिटने के बाद धर्मस्थान से राजमहल की ओर जाते समय माँ कमलप्रभा क दर्शन हए । श्रीपाल ने चरण छकर कहा :- "मयणा ! यह तुम्हारी सास है । प्रणाम करो ।" मयणा प्रणाम करके बहुत खुश हुई। तीनों राजमहल में गये । प्रजापाल ने कमलप्रभा का स्वागत किया और पूछने पर अपना पिछला वृत्तान्त इस प्रकार सुनाया :- “हे राजन् ! में चम्पानरेश सिंहरथ की रानी हूँ। श्रीपाल मेरा पुत्रा है । जब यह पाँच वर्ष का था तब इसक पिता चल बसे । राज्य हड़पने के लिए इसके काका अजितसेन इसे जान से मार डालना चाहते है- एसी भनक पड़ते ही मैं इसके प्राण बचाने क लिए इसे लेकर जंगल में भाग गई । वहाँ सात सौ कोढियों के एक दल को देखा । श्रीपाल को सुरक्षा के लिए मैंने दल के साथ भेज दिया और में कोढ के इलाज की दवा हँढन चल पड़ी । वर्षों बाद आज अकस्मात् इसे अपनी सह धमिणी क साथ देखा और इन दोनों के अनुरोध से राजमहल में चली आई। राजा ने राजमहल के एक सुन्दर कक्ष में तीनों को ठहराया । वे सानन्द रहने लगे । एक दिन श्रीपाल ने नगर में पर्यटन करते समय किसी प्रजाजन को यह कहते हुए सुना कि ये प्रजापाल के जमाई हैं । यह बात चुभ गई; क्यों कि नीतिकारों ने कहा है : .. उत्तमाः स्वगुणैः ख्याताः, मध्यमास्तु पितुर्गुणैः । अधमाः पातुलैः ख्याताः, श्वशुरैरधमाधमाः || (उत्तम अपने गुणों से विख्यात होते है; मध्यम पिता के गुणों से, नीच मामा के गणों से और नीचतम व्यक्ति ससुर के नाम से जाने जाते हैं) ११३ For Private And Personal Use Only
SR No.008731
Book TitlePratibodh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmasagarsuri
PublisherArunoday Foundation
Publication Year1993
Total Pages122
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Discourse
File Size6 MB
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