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कल्पनातीत होगी, मंजुल फलों का वह रसास्वाद वचनातीत होगा। प्रिय ! प्रभो!! प्रेम की सभी चीजें अवर्णनीय होती हैं। प्रेम की धूल में भी आनन्द है,
और प्रेम की भूल में भी आनंद होता है। पार्थिव मूल्य के साथ प्रेम का संम्बध नहीं यह एक मात्र वस्तु आदान में चाहता है ताजगी भरा निखालस और निर्मल प्रेम !
३७. साथी
साथी नवकार !
मझसे मिलने के लिए आप अनादि काल से चलते चले आते प्रतीत होते हो। अगणित संध्या और प्रभात के पूर्व भी आप कहीं थे जरूर और आपके दूत अन्तर मन को किसी समय चुपचाप निमन्त्रण दे जाते हैं। यह हे साथी ! ज्ञात नहीं होता कियह मन हर्षातिरेक से इतना प्रफुल्लित क्यों हो रहा है ?
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हे नवकार महान
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