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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir दाविश श्री नेमिनाथजिन स्तवनं. ७६१. ------- - लंब्या एटले भर्तारपणानो अशुद्ध राग टाली देवतत्त्वने रागें आदर्या, एम विचार्यु जे उत्तमने संगे उत्तमता वधे, एटले चारित्रवंत सर्वज्ञ श्रीनेमीश्वर भगवान् ते सर्वोत्तम छे तो एना संगयी महारी पण उत्तमता एटले सिद्धता पूर्णात्मता वधे, वली सधे केतां नीपजे. आनंद केतां आत्यंतिक, ऐकांतिक, निद्व, निरामय सुख थाय, तेमाटे तेहीज करवू घटे, एम सर्व भव्य जीवोयें विचार ॥ २॥ इति द्वितीयगाथार्थः । धर्म अधर्म आकाश अचेतना, ते विजाति अग्राह्यो जी॥ पुद्गल ग्रहवे रे कर्मकलंकता, वाधे बाधक वाह्यो जी ॥ ने० ॥ ३ ॥ अर्थः-हवे राजीमतीये जे विचायु, ते कहे छे. सर्व. लोकमां पंचास्तिकाय छे, अने काल ते छती रूपें द्रव्य नथी, श्रीभाष्यकार तथा अनुयोगद्वारसूत्र जोतां उपचारद्रव्य छे वली पंचास्तिकायमां धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्तिकाय, ए त्रण द्रव्य अचेतन छे, तथा विजाति छे. वली जीवद्रव्यनी ए जाति नहीं, अग्राह्य छे, ते अपरिणामीपणा तथा अचलपणा माटे जीवथी ग्रहवाय नहीं, तेमाटे एहथी पण माहरे काम नहीं, तथा पुद्गल द्रव्य साथै चिरकालनो परिचय छे, तेहने जो ग्रहीये, तो पुद्गल जडद्रव्यने ग्रहवे आत्माने नवां कर्म बंधाय, अने आत्मा कलंकसहित थाय, अने बाधकमात्र, परकर्तृता, स्वगुणरोधकता, चेतनादि गुणनी विपर्यासता वाधे केतां वृद्धि पामे, ते माटे पुद्गलने लेतां 96 For Private And Personal Use Only
SR No.008662
Book TitleShrimad Devchandra Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year
Total Pages670
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Worship
File Size9 MB
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