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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir परमात्मदर्शन. ( २३३ ) हता, माटे गृहस्थ श्रावक जिन प्रतिमानी अवश्य पूजा करे. दि अधिकार समजी लेवो. For Private And Personal Use Only द्वितीय सूत्रपाठ तणं सा दोव रायवरकन्ना, जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छइ. उवा० मज्जणघरं अणुपविसइ, अणुर व्हाया कय बलिकम्मा कयको मंगलपायछित्ता सुध्धप्पा वेसाई, मंगलाई, वध्थाई, पवरपरिहिया मज्जणघराओ पडिनिरकमइ, पडि२ जेणेव जिणघरे तेणेव उवागच्छ उवा२ जिगघरं अणु पविस जिणपडिमाण आलोए, पण मंकरेइ, लोमहथ्थगं गिन्हइ. : तार जिणपडिमाओ पमज्जे, ता मुरभिणा गंधोदएणं व्हावेइ, तार सुरभिए गंधकासाइए गत्ताई लहेइ, नार सुरसेहिं मल्लेहिअ अच्चेड़ जहा सुरियाभो जिण पडिमाओ अच्छे अच्चेइत्ता तहेव भाणिअव्वं जाव धूर्व दहर, दहइत्ता, वामं जाणुं अंचर, अंचइत्ता, दाहिणं जाणुं धरणिअलंमि बहुतिखुत्तो-इत्यादिपाठः भावार्थ - राजकन्या द्रौपदी स्नान करना मज्जनगृहमां जाय अने त्यांथी जिनेश्वरना देरासरमां जाय. प्रभुनी प्रतिमाने देखी प्रणाम करे. रुडा लोम हस्तकथी जिन प्रतिमानुं प्रजार्जन करे. सुरभि गंधमिश्रितजलथी प्रभुनी प्रतिमानुं स्नान करे पश्चात् अंगलुंहन करे, पश्चात् गंधादिकनुं विलेपन करे - इत्यादि घणा पाठ छे तेथी सिद्ध थायछे के - प्रभुनी पडिमा एटले प्रतिमा छे. महानिशीथमां पण प्रभुनी प्रतिमा विषे पाउछे-माटे जिन प्रतिमाम जिनेश्वरनी आरोप करी मानतां पूजतां आत्महित थायछे. वी ज्यारे श्रीतीर्थंकर भगवान् समवसरणमां पूर्वदिशा सन्मुखसेछे अने दक्षणि, पश्चिम, उत्तरदिशिना द्वारे श्री अरिहंतना प्रतिबिंब स्थापेछे, ते ऋण दिशाना स्थापनाजिननो आलंबन पामीने अनेक इत्या •
SR No.008627
Book TitleParmatma Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year1910
Total Pages432
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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