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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir परमात्मदर्शन. भूत थायछे, अज्ञानीने संवरना हेतुओ आश्रवरूपे परिणमेछे अने स्याद्वादरूपे जेणे आत्मतत्त्व जाण्युंछे एवा ज्ञानीने आश्रवना हेतुओ पण संवररूपे परिणमेछे, एम ज्ञानीओन कथनछे.-प्रथम कोई अपेक्षाए अजीवतत्त्वनुं ज्ञान करवू जोइए. कारणे अजीवने अवबोधतां सहेजे तेथी भिन्नजीव जाण्यो जायछे, जीवाजीवादि नवतत्वोनो सम्यगवबोध भेदज्ञान थवामा मुख्य हेतुछे. आत्मज्ञानथी मुनिवर्यो मुक्तिपद प्राप्त करेछे. कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्र पण कहेछे के श्लोक. योगशास्त्रे. मोक्षः कर्मक्षयादेव, सचात्माज्ञानतो भवेत् । ज्ञानसाध्यं मतं तच, तड्यानं हितमात्मनः १ न साम्येन विना ध्यानं नध्याने न विना च तत् । निःकंपं जायते तस्माद,द्रयमन्योन्य कारणम् । मोक्षपद प्राप्ति काष्टकक्षयतः थायछे, अने भवसंतति वृद्धि कारणीभूतकर्माष्टकनो क्षय आत्मज्ञानथी थायछे. इत्यादिथीविचारतां आत्मज्ञान थq एज सर्व शास्त्रनो स्पष्ट रहस्यभूत उद्देश समजायछे. मतिज्ञान अने श्रुतज्ञाननायोगे अस्ति नास्ति धर्ममय आत्मानुं ध्यान थायछे, अने ध्यान पण आत्मानुं समजवं. ध्यानयोगे स्थिरतापगटतां अनंत सुख अनुभवी आत्मा बनेछे, अने अनुभव ज्ञानयोगे भव्यात्मा सुखनो आस्वादी बनछे. कोइ वस्तुपर राग नहीं अने कोइ वस्तुपर द्वेष नहीं एवी आत्मानी अवस्थाने साम्य अवस्था कहेछे. मूर्यना समान ज्ञान गुणे प्रकाशी आत्मा समजवो. सूर्य अभ्रयी भाच्छादित थता तेना किरणोना प्रकाशनु पण आच्छादन थायछे, For Private And Personal Use Only
SR No.008627
Book TitleParmatma Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year1910
Total Pages432
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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