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कांइने कां विशेषता अवश्यमेव होय छे ज; तेवी ज रीते श्रा ' लघु स्तोत्ररत्नाकर प्रथम भाग मां संग्रहीत स्तोत्रो पण तेनी विशेषताने लइ जरूर तेनो उपयोग करनाराओ माटे आदरणीय अने पाठ्य थइ पडशे. एत्री अमने खात्री छे । श्र पुस्तकमा अनेक संस्कृत - प्राकृत ग्रंथोना कर्ता तथा केटलाक प्राचीन ग्रंथोना भाषान्तरकार ने विविध विषयो परत्वे कवितामां गानार आचार्य श्रीमद्- अजित सागरसूरिजीनां रचित स्तोत्रो तथा तेमना शिष्य साहित्यरसिक मुनिश्री हेमेन्द्रसागरजीनां रचित केटलॉक स्तोत्रो - अष्टको साथै अर्बुद - आबूवर्णन विगेरे छे । उपरांत मां प्राचीन आचार्योनां पण पूर्वघर श्रीभद्रबाहुसूरिरचित - मंत्रगर्भित उवसग्गद्दर स्तोत्र' 'उवसग्गद्दरपादपूर्ति ' प्राचीन पद्मावती अष्टक, बप्पभट्टिसूरिकृत ' सरस्वती स्तोत्र प्रतिष्ठाकल्प आदिमां वर्णन करायेल श्री शासनरक्षक ' घंटाकर्ण वीरस्तोत्र मंत्रकल्प ' विगेरे बहु महत्त्वमय केटलाक चमत्कारिक स्तोत्रो छे, के जेनो वांचको पाठादिथी उपयोग करी लाभ लेशे अने ते द्वारा अमे आ अमारो प्रयास सफळ थयो मानीशुं ।
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आ पुस्तकनुं संशोधन कार्य मुनिराज श्री हेमेन्द्रसागरजी महाराजे करी आप्युं छे ते मांट श्रमे तेश्रो श्रीनो आभार मानीए छीए ।
ता. १४-१०-३५
प्रकाशक
बीजापुर - (गुजरात) बुद्धिसागरसूरि जैन ज्ञानमंदिर.
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