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________________ Version 001: remember to check http://www.AtmaDharma.com for updates पंचास्तिकायसंग्रह [भगवानश्रीकुन्दकुन्द दुर्निवारनयानीकविरोधध्वंसनौषधिः। स्यात्कारजीविता जीयाज्जैनी सिद्धान्तपद्धतिः।।२।। सम्यग्ज्ञानामलज्योतिर्जननी द्विनयाश्रया। अथात: समयव्याख्या संक्षेपेणाऽभिधीयते।।३।। [अब टीकाकार आचार्यदेव श्लोक द्वारा जिनवाणीकी स्तुति करते हैं:--] [श्लोकार्थ:-] स्यात्कार जिसका जीवन है ऐसी जैनी [-जिनभगवानकी] सिद्धांतपद्धति - जो कि दुर्निवार नयसमूहके विरोधका नाश करनेवाली औषधि है वह- जयवंत हो। [२] [अब टीकाकार आचार्यदेव श्लोक द्वारा इस पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रकी टीका रचने की प्रतिज्ञा करते हैं] [श्लोकार्थ:-] अब यहाँसे, जो सम्यग्ज्ञानरूपी निर्मल ज्योतिकी जननी है ऐसी द्विनयाश्रित [ दो नयोंका आश्रय करनारी ] समयव्याख्या [ पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रकी समयव्याख्या नामक टीका ] संक्षेपसे कही जाती है। [३] [अब, तीन श्लोकों द्वारा टीकाकार आचार्यदेव अत्यन्त संक्षेपमें यह बतलाते हैं कि इस पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रमें किन-किन विषयोंका निरूपण है:---] १. ' स्यात्' पद जिनदेवकी सिद्धान्तपद्धतिका जीवन है। [ स्यात् = कथंचित; किसी अपेक्षासे; किसी प्रकारसे।] २. दुर्निवार = निवारण करना कठिन; टालना कठिन। ३. प्रत्येक वस्तु नित्यत्व, अनित्यत्व आदि अनेक अन्तमय [धर्ममय] है। वस्तुकी सर्वथा नित्यता तथा सर्वथा अनित्यता माननेमें पूर्ण विरोध आनेपर भी, कथंचित [अर्थात् द्रव्य-अपेक्षासे ] नित्यता और कथंचित [अर्थात् पर्याय- अपेक्षासे] अनित्यता माननेमें किंचित विरोध नहीं आता-ऐसा जिनवाणी स्पष्ट समझाती है। इसप्रकार जिनभगवानकी वाणी स्याद्वाद द्वारा [अपेक्षा-कथनसे] वस्तुका परम यथार्थ निरूपण करके, नित्यत्वअनित्यत्वादि धर्मोंमें [ तथा उन-उन धर्मोको बतलानेवाले नयोंमें] अविरोध [ सुमेल] अबाधितरूपसे सिद्ध करती है और उन धर्मोंके बिना वस्तुकी निष्पत्ति ही नहीं हो सकती ऐसा निर्बाधरूपसे स्थापित करती है। ४. समयव्याख्या = समयकी व्याख्या; पंचास्तिकायकी व्याख्या; द्रव्यकी व्याख्या; पदार्थकी व्याख्या। [ व्याख्या = व्याख्यान; स्पष्ट कथन; विवरण; स्पष्टीकरण।] Please inform us of any errors on [email protected]
SR No.008395
Book TitlePunchaastikaai Sangrah
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
Publication Year2008
Total Pages293
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size3 MB
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