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________________ FFFF T9 ॥ जो मनुष्य यह कहते हैं कि मांस खाने में कोई दोष नहीं है, वे लोग मनुष्य के रूप में भेड़िया, सिंह गिद्ध, स्वान, व्याघ्र, श्रृगाल और भीलों की संख्या ही बढ़ा रहे हैं। इसी संबंध में आचार्य अमृतचन्द्र का चिन्तन भी द्रष्टव्य है। वे लिखेंगे कि प्राणिघात के बिना मांस की उत्पत्ति संभव नहीं है; अत: मांस को खानेवाले पुरुषों के अनिवार्यरूप से हिंसा होती है। जो स्वयं ही अपनी मौत मरे हुए भैंस, बैल, गाय आदि पशुओं का मांस है, उसके सेवन में भी उस मांस के आश्रित रहनेवाले असंख्य-अनंत सूक्ष्म निगोदिया जीवों के विनाश में हिंसा होती है। कच्ची, पकी या पक रही मांस की पेशियों में उसी पशु की जाति के अनंत निगोदिया जीवों की निरंतर उत्पत्ति होती है; अत: जो व्यक्ति कच्ची या पकी हुई मांसपेशी को खाता है या छूता भी है, वह अनेक कोटि जीवों का घात करता है। अत: मांस सर्वथा अभक्ष्य है। मांस स्वभाव से ही अपवित्र है, दुर्गन्धभरा है, दूसरों के प्राणघात से ही मांस का उत्पादन होता है तथा कसाई के घर जैसे दुःस्थान से प्राप्त होता है और फलकाल में दुर्गति का कारण है। ऐसे मांस को भले आदमी कैसे खा सकते हैं ? जिस पशु-पक्षी को हम मांस खाने के लिए मारते हैं, यदि वह हमें दूसरे जन्म में न मारता होता, बदला न लेता होता तो भले हम पशु हत्या कर लेते अथवा मांस के बिना जीवन का अस्तित्व ही संभव न होता तो भी पशु हत्या करने का कुछ औचित्य समझ में आ सकता था; परन्तु ऐसी बात नहीं है । मांस के बिना भी हमारा जीवन चलता ही है और हम जिसकी हत्या करेंगे, अवसर आने पर वह भी हमारा मांस नोंचनोंच कर खायेगा ही, फिर भी हम ऐसी मूर्खता क्यों करते हैं ? यह बात गंभीरता से विचारणीय है। श्रमणसंस्कृति के सिवाय वैदिक संस्कृति में भी मांसाहार को अभक्ष्य और अखाद्य बताया जायेगा, उसका निषेध भी किया जायेगा। महाभारत समस्त हिन्दू समाज का अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ होगा, उसमें मांसाहार का निषेध करते हुए | कहा गया है कि - FFER
SR No.008375
Book TitleSalaka Purush Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Bharilla
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year2003
Total Pages384
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size1 MB
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