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अच्छे प्रकार से छाने गये जल में भी एक मुहूर्त अर्थात् दो घड़ी के पश्चात् सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते | हैं । प्रासुक किया हुआ जल दो प्रहर के पश्चात् तथा खूब उष्ण किया हुआ (उबला हुआ ) जल आठ प्रहर | के बाद सम्मूर्छित हो जाता है ।
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पूर्वोक्त कथन के समर्थन में छने पानी की समय सीमा के विषय में निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है
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मूर्तं गालितं तोयं, प्रासुकं प्रहर द्वयम् । उष्णोदकमहोरात्रं, तत: सम्मूर्छितभवेत् ।।
ध्यान रहे! तत्काल का छना पानी एक मुहूर्त, प्रासुक किया दो प्रहर तथा उबाला हुआ पानी चौबीस | घंटे बाद सम्मूर्छित हो जाता है।
जेण अगालिउ जलुपियइ, जाणिज्जइ न पवाणु ।
जो तं पियइ अगालिउ, सो धीवरह पहाणु ।। २७ ।।
जो अगालित जल पीता है, वह जिन-आज्ञा को नहीं जानता । तथा जो अगालित जल पीता है, वह धीवरों में प्रधान है।
अत: हे बुद्धिमान श्रावक ! स्नान करने में, वस्त्र धोने तथा किसी भी वस्तु का प्रक्षालन करने में तत्काल का छाना हुआ पानी ही काम में लेना चाहिए; क्योंकि जो बिना छने पानी से स्नान आदि भी करते हैं, उनसे जीवों की हिंसा होती है और हिंसा होने से अहिंसा धर्म का नाश होता है।
वस्त्रगालित जल पीना न केवल जैनों का कर्तव्य है; बल्कि जैनेतर धर्मग्रन्थों में भी पानी छानकर ही पीने का विधान है । दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं, पट पूतं जलं पिवेत् ।
जीवरक्षा हेतु देखकर कदम रखो और कपड़े से छानकर पानी पीओ ।
जैनेतरों के ही दूसरे ग्रन्थ लिंगपुराण में लिखा जायेगा -
संवत्सरेण यत्पापं कुरुते मत्स्य वेधकः । एकाहेन तदाप्नोति, अपूत जल संकुली ।।
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