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4. 27-21] In the Anuttara vimanas, there is no mention of 'Marut.' The Sthananga and other sutras contain nine types. In the Uttamacharita, there is even mention of ten types. This indicates that the text of 'Maruto' was later inserted into the original sutra. 25-26. Characteristics of the Deities of Anuttara Vimana Vijayadis are dual-born. 27. The deities of Vijayadi are dual-born, meaning they take human birth twice to attain liberation. There are five Anuttara vimanas. Among them, the deities of Vijay, Vaijayanta, Jayanta, and Aparajita are dual-born. They attain liberation by taking human birth at most twice. The sequence is such that after falling from the four Anuttara vimanas, they take human birth, then divine birth in the Anuttara Vimana, followed by another human birth, and from that birth, they achieve liberation. However, the deities residing in the Sarvarthasiddha Vimana, after falling, take human birth only once and achieve liberation in that birth. There are no specific rules for deities other than those residing in the Anuttara Vimana since some attain liberation with just one human birth, while others take two, three, four, or even more human births. 27. Nature of Tiryaka 'Of the Upapadika and humans, the rest are Tiryaka.' 28. The remaining beings, excluding Upapadikas (deities and Narakas) and humans, are of the Tiryaka birth. The answer to the question "Who is Tiryaka?" is explained in this sutra. All worldly beings, except Upapadikas (deities and Narakas) and humans, are Tiryaka. Deities, Narakas, and humans possess five senses, while Tiryaka includes beings with one sense up to beings with five senses. Deities, Narakas, and humans exist only in specific parts of the universe, not in Tiryaka, as the latter can be found in all parts of the universe. 28. Adhikārā Sutra Status. 29. The description of life span is given.
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________________ ४. २७-२१ ] अनुत्तर विमानो के देव, तिथंच, अधिकार-सूत्र १०९ होती है, उसमें 'मरुत' का उल्लेख नही है। स्थानाङ्ग आदि सूत्रों में नौ भेद मिलते है । उत्तमचरित्र में तो दस भेदों का भी उल्लेख मिलता है । इससे ज्ञात होता है कि मूल सूत्र में 'मरुतो' पाठ बाद मे प्रक्षिप्त हुआ है । २५-२६ । अनुत्तर विमानों के देवो की विशेषता विजयादिषु द्विचरमाः। २७ । विजयादि के देव द्विचरम होते है अर्थात् दो बार मनुष्यजन्म धारण कर मोक्ष प्राप्त करते हैं । अनुत्तर विमान पाँच है । उनमे से विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित इन चार विमानों के देव द्विचरम होते है । वे अधिक-से-अधिक दो बार मनुष्यजन्म धारण करके मोक्ष प्राप्त कर लेते है । इसका क्रम इस प्रकार है कि चार अनुत्तर विमानों से च्युत होने के बाद मनुष्यजन्म, उसके बाद अनुत्तर विमान मे देवजन्म, वहाँ से फिर मनुष्यजन्म और उसी जन्म से मोक्ष । परन्तु सर्वार्थसिद्ध विमानवासी देव च्युत होने के बाद केवल एक बार मनुष्यजन्म धारण करके उसी जन्म से मोक्ष प्राप्त करते है। अनुत्तर विमानवासी देवों के अतिरिक्त अन्य सब देवों के लिए कोई नियम नहीं है, क्योकि कोई तो एक ही गर मनुष्यजन्म लेकर मोक्ष जाते है, कोई दो बार तीन बार, चार बार या और भी अधिक बार मनुष्यजन्म धारण करते है । २७ । तिर्यचो का स्वरूप __ औपपातिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः । २८ । औपपातिक और मनुष्य से जो शेष हैं वे तिर्यच योनिवाले हैं। 'तिर्यच कौन है ?' इस प्रश्न का उत्तर इस सूत्र में वर्णित है । औपपातिक ( देव तथा नारक ) तथा मनुष्य को छोडकर शेष सभी संसारी जीव तिर्यच है । देव, नारक और मनुष्य केवल पञ्चेन्द्रिय होते है, पर तिर्यंच मे एकेंद्रिय से पचेद्रिय तक सब जीव आ जाते है । देव, नारक और मनुष्य लोक के विशेष भागों मे ही होते है, तिर्यञ्च नहीं, क्योकि उनका स्थान लोक के सब भागों में है । २८ । अधिकार-पूत्र स्थितिः । २९ । आयु का वर्णन किया जाता है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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