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________________ 32 तत्त्वार्थ सूत्र देवों का कामसुख कायप्रवीचारा आ-ऐशानात् । ८ । शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनः प्रवीचारा द्वयोर्द्वयोः । २ । परेऽप्रवीचाराः । १० । ऐशान कल्प तक के देव कायप्रवीचार होते हैं अर्थात् शरीर से विषयसुख भोगते हैं । [ ४. ८-१० शेष देव दो-दो कल्पों में क्रमशः स्पर्श, रूप, शब्द और संकल्प द्वारा विषयसुख भोगते हैं । अन्य सब देव प्रवीचार से रहित अर्थात् वैषयिक सुखभोग से मुक्त होते हैं । भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिष्क तथा पहले व दूसरे कल्प के वैमानिक ये सब देव मनुष्य की भाँति शरीर से कामसुख का अनुभव करके प्रसन्न होते है । Jain Education International तीसरे कल्प तथा ऊपर के सभी कल्पों के वैमानिक देव मनुष्य के समान सर्वाङ्गीण शरीरस्पर्श द्वारा कामसुख नही भोगते, अपितु अन्यान्य प्रकार से वैषयिक सुख भोगते है । तीसरे और चौथे कल्प के देवो की तो देवियो के स्पर्शमात्र से कामतृप्ति हो जाती है । पाँचवें और छठे स्वर्ग के देव देवियों के सुसज्जित ( श्रृंगारित ) रूप को देखकर ही विषयसुख प्राप्त कर लेते है। सातवे और आठवें स्वर्ग के देवों की कामवासना देवियो के विविध शब्दो को सुनने से पूरी हो जाती है । नवें और दसवे तथा ग्यारहवें और बारहवे इन दो जोड़ों अर्थात् चार स्वर्गो के देवों की वैषयिक तृप्ति देवियो का चिन्तन करने मात्र से हो जाती है । इस तृप्ति के लिए उन्हें न तो देवियो के स्पर्श की, न उनका रूप देखने की और न गीत आदि सुनने की आवश्यकता रहती है । सारांश यह है कि दूसरे स्वर्ग तक ही देवियाँ हैं, ऊपर के कल्पों में नही है । वे जब तृतीय आदि ऊपर के स्वर्गो के देवों को विषयसुख के लिए उत्सुक अर्थात् अपनी ओर आदरशील जानती है तभी वे उनके निकट पहुँचती है । देवियो के हस्त आदि के स्पर्श मात्र से तीसरे चौथे स्वर्ग के देवों की कामतृप्ति हो जाती है । उनके श्रृंगारसज्जित मनोहर रूप को देखने मात्र से पाँचवें और छठे स्वर्ग के देवो की कामलालसा पूर्ण हो जाती है । इसी प्रकार उनके सुन्दर संगीतमय शब्दों के श्रवण मात्र से सातवें और आठवे स्वर्ग के देव वैषयिक आनन्द का अनुभव प्राप्त कर लेते है । देवियों की पहुँच आठवे स्वर्ग तक ही है, ऊपर नही । नवे से बारहवे स्वर्ग तक के देवो की काम-सुखतृप्ति केवल देवियों का चिन्तन करने से ही हो जाती है । बारहवें स्वर्ग से ऊपर के देव शान्त और For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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