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________________ २. ५२] वेद ( लिंग ) के प्रकार परिणाम निकल आता है और दूसरा साधारण जानकार मनुष्य भागाकार आदि विलम्ब-साध्य क्रिया द्वारा देरी से अभीष्ट परिणाम निकाल पाता है । परिणाम तुल्य होने पर भी दक्ष गणितज्ञ उसे शीघ्र निकाल लेता है और साधारण गणितज्ञ देरी से निकालता है । इसी तरह समान रूप मे भीगे हुए दो कपड़ों में से एक को समेटकर और दूसरे को फैलाकर सुखाने पर पहला देरी से सूखता है और दूसरा जल्दी । पानी का परिमाण और शोषणक्रिया समान होने पर भी कपड़े के संकोच और विस्तार के कारण सूखने में देरी और जल्दो का अन्तर पड़ता है । समान परिमाणयुक्त अपवर्तनीय और अनपवर्तनीय आयु के भोगने मे भी केवल देरी और जल्दी का ही अन्तर पड़ता है। इसलिए कृत का नाश आदि उक्त दोष नही आते । ५२। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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