SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 142
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ - ११५ - सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥ ३३ ॥ जराय्वण्डपोतजानां गर्भः ॥ ३४ ॥ नारकदेवानामुपपातः ॥ ३५ ॥ शेषाणां सम्मूर्छनम् ॥ ३६॥ औदारिकवैक्रियाऽऽहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥ ३७॥ परं परं सूक्ष्मम् ॥ ३८॥ प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात् ॥ ३९ ॥ अनन्तगुणे परे ॥४०॥ अप्रतिघाते ॥४१॥ अनादिसम्बन्धे च ॥४२॥ सर्वस्य ॥४३॥ तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्याचतुभ्यः ॥ ४४ ॥ निरुपभोगमन्त्यम् ॥ ४५ ॥ गर्भसम्मूर्छनजमाद्यम् ॥४६॥ १. जरायुजाण्डपोतजानां गर्भ-हा० । जरायुजाण्डपोतानां गर्भ.-स० रा० श्लो० । रा० और श्लो० 'पोतज' पाठ पर आपत्ति करते है। सिद्धसेन को यह आपत्ति ठीक नहीं मालूम होती। २. देवनारकाणामुपपाद:-स० रा० श्लो० । ३. वत्रियिका-स० रा० श्लो० । ४. सिद्धसेन का कहना है कि कोई 'शरीराणि' को अलग सूत्र समझते है । ५. भा० मे तेषां पद सूत्रांश के रूप मे छपा है, लेकिन भाष्यटीकाकारो के मत में यह भाष्य का अंश है । ६. अप्रतीघाते-स० रा० श्लो० । ७. देकस्मिन्नाचतु-स० रा० श्लो० । लेकिन टीक्यों से मालूम होता है कि एकस्य सूत्रपाठ अभिप्रेत है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy