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________________ कभी हो ही नही सकता कि किसी दूसरेके परिणमनसे किसी दूसरे को सुख दुःख मिले। यह तो एक मोहमें बकवाद है। कितने ही लोग कहते है कि हमारा दिल तो तुम ही में धरा है, पर ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसीका दिल किसी दूसरेके दिलमें धर जाय। जिस वस्तुका जो परिणमन है वह उस वस्तुमें ही सन्निहित रहेगा, अन्यत्र पहुंच नही सकता। जो ऐसी गप्पें मारते है उनकी पूरी परीक्षा करना हो तो उनके मनके खिलाफ दो एक काम कर बैठो, सब निर्णय सामने आयगा। परमार्थ गुरू - आजकल कितना अच्छा हमें संयोग मिला है? गुरूजनोका हितकारी उपदेश भी मिलता है लेकिन स्वयं ही इस प्रकार की अभिलाषा करे, ध्यान जमायें, आचरणकरे तो मोक्षमार्ग नही मिलता, वह केवल निमित्तरूप कारण है इसलिए वास्तविक गुरू तो आत्माक आत्मा ही है क्योकि आत्मसुखकी प्राप्ति हो, मोक्ष मिले ऐसी रूचि भी इसको ही करना होता है। परमार्थसे मेरे हितरूप तो मोक्ष ही है ऐसा यथार्थज्ञान इसको ही करना होता है, ऐसा यत्न, ऐसी भावना और इस प्रकारकी प्रवृत्ति इस ही को करना पड़ती है। तब गुरू स्वंयका स्वंय ही हुआ ना। कोई दोष बन जाय तो इसको ही अपनी निन्दा, गर्हा, आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, ध्यान ये सब इसको ही करने पड़ते है तब दोषो की शुद्धि होती है। कल्याणके लिए विषय सुखों से सुख मोड़ना प्रथम आवश्यक है। यह भी एक तप है जो सुगम मिले हुए विषयसाधनोमें भी आसक्ति उपन्न नही होती। वह बात स्वंयको ही करना पड़ता है। स्वंयके कार्यमें स्वंयका कर्तृत्व – भैया ! जैसे और कामोमें लोग कहते है चलो रहने दो, यह काम हमी करें आते है। शायद कोई ऐसा भी कह देता हो कि चलो तुम यहाँ ही बैठो हम ही दर्शन किए आते है, तुम्हारा जगह पर मंदिरका दर्शन हम कर आयेगें और कहे आयेगें कि हमारे बब्बूका भी दर्शन ले लो। ऐसा तो शायद कोई भी न कहता होगा, और ऐसा कह भी दिया यदि किसीने तो क्या दर्शन हो गया? ध्यान और ज्ञानके अंतः प्रयोगकी बात तो सबसे अनोखी बात है। खुदको ही ज्ञान ध्यान तपमें रत होना पड़ता हे और स्वंय ही स्वयंमें प्रसन्न रहे तब मोक्षमार्ग मिलता है, इसलिए आत्माका गुरू यह आत्मा ही हुआ, आत्मा चाहे तो अपनेको संसारी बनाए और चाहे तो मोक्ष सुखमें ले जाए, दूसरा मेरी परिणतिका अथवा स्वभावका कर्ता धर्ता नही है। स्वय ही शुभ भाव करता है तो उत्तम गति पाता है और स्वंय ही कुभाव करता है तो खोटी गति पाता है, और शुभ और अशुभ भावोका परित्याग करके आत्माके शुद्ध चेतन्यस्वरूपमें जब यह विचरने लगता है तो कर्म बंधनोको तोड़कर मुक्तिको भी यह अकेले प्राप्त करता है। यही जीव भ्रमी बनकर संसारमं रूलता है। कथन और आचरण - विषयोंसे मुझे सुख मिलता है ऐसी भीतरमें वसना बसी है, मुखसे कुछ भी कहे, धर्मके नामपर ज्ञान और वैराग्यकी बात भी कहें किन्तु प्रतीतिमें वही 146
SR No.007871
Book TitleIshtopadesh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSahajanand Maharaj
PublisherSahajanand Shastramala Merath
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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