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________________ अर्थ:-हे भगवन् ! वे संमूछिम मनुष्य कहाँ उत्पन्न होते हैं ? । हे गौतम ! १५ लाख योजन मनुष्यक्षेत्रमें, ढाईद्वीपमें, पनरह कर्मभूमिमें, तीस अकर्मभूमिमें, ५६ अंतरद्वीपमें, गर्भजमनुष्योंकी विष्ठामें १, पिशाबमें २, कफमें ३, श्लेष्ममें ४, वमनमें ५, पित्तमें ६, राधमें ७, लोहीम ८, वीर्यमें ९, शुष्कपुद्गल के परिवर्तनमें, १०, जीवरहित कलेवरमें ११, स्त्री-पुरुषके रुधिरवीर्यके संयोगमें १२, खाल-गटरमें १३, और समस्त अशुचि पदार्थोंमें १४, संमूछिम मनुष्य उत्पन्न होते हैं । अब, बतावें तेरापंथी, भगवान्के वचनानुसार तुम्हारी मुहपत्तियोंमें, जो कि दिनभर मूंहपर बांधे रखनेसे आली हो जाती हैं, संमूछिम जीवोंका उत्पन्न होना सिद्ध हुआ कि नहीं ? । अब वे जीव, जो मरेंगे, उत्पन्न होंगे, मरेंगे उत्पन्न होंगे, उसका पाप आपको लगेगा, या उन मुहपत्तियोंको ? । __ यहाँपर तेरापंथी लोग, एक यह युक्ति आगे करते हैं कि, " जैसे किसीको फोडा हुआ हो, उसपर पट्टी बांधनेसे उस पट्टीमें जैसे जीवोत्पत्ति नहीं होती, वैसे मूंहपर मुहपत्ती बांधनेसे उसमें भी जीवोत्पत्ति नहीं होती।" लेकिन यह युक्ति ठीक नहीं है । फोडेके ऊपर बांधी हुई पट्टीमें जीवोत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि वह पट्टी कसकरके बांधनेसे शरीरकी गर्मीका असर पहुँचता है। परन्तु आप लोग, मुहपत्ती, मूंहपर कसकरके नहीं बांधते । अतएष खुली रहती है । इससे उष्णताकी असर उसपर नहीं होती । और इसीसे मुहपत्तीमें लगे हुए थूक-कफमें अवश्य जीव.त्पत्ति होती है । हम समझते हैं कि-शायद ऐसे अशुचिपदार्थोंमें अशुचिपना नहीं माननेके कारणहीसे तेरापंथी लोग, खियोंके रजस्वला
SR No.007294
Book TitleTerapanthi Hitshiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherAbhaychand Bhagwan Gandhi
Publication Year1915
Total Pages184
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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