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प्रा० जै० इ० तीसरा भाग
रानी गुफा की खोज से मालूम हुआ है कि एक शिलालेख में, जो रानी घूषि का खुदाया हुआ है, खारवेल को चक्रवर्ती लिखा है । एक गुफा के शिलालेख में यह बात खुदी हुई पाई गई है. कि वहाँ पर जैन मुनि शुभचन्द्र और कूलचन्द्र रहते थे । यह लेख विक्रम की दसवीं सदी का है । एक गुफ़ा में महाराजा उद्योतन केसरी के समय का लेख है इस के अलावा भी कलिंग की प्राचीनता और गुफ़ाओं का वर्णन, मुनि जिनविजयजी की प्रकाशित की हुई " प्राचीन जैन लेख संग्रह” नामक पुस्तक के प्रथम भाग केविस्तृत उपोद्घात के पठन से मालूम हो सकता है ।
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कलिङ्गाधिपति महामेघवाहन चक्रवर्ती महाराजा खारवेल के शिलालेखने आज युरोपीय और भारतीय पुरातत्वज्ञों के कार्य में चहल पहल तथा धूम मचा दी है । लगभग एक सदी के कठिन परिश्रम के पश्चात् उन्होंने निश्चय किया है कि कलिङ्गाधिपति चक्रवर्ती महाराजा खारवेल जैन सम्राट था और उसने जैन धर्म का खूब प्रचार भी किया था । यह ध्वनि जब कतिपय सोए हुए जैनियों के ( व्यक्तियों के) कानों में पड़ी तब उन विद्वानोंने भी अपनी निन्द्रा त्यागदी । उन्होंने अपने बंद भण्डारों के ताले खोले । पन्नों को ऊथल पुथल करना प्रारम्भ किया तो अहोभाग्य से कुछ पन्ने ऐसे भी मिल गये कि जिन में खारवेल के शिलालेख से सम्बन्ध रखनेवाली बातें मिलती थीं ।