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गाथा ८८ : परमार्थप्रतिक्रमणाधिकार
और शुभराग आस्रव हैं; उनसे भिन्न चैतन्यस्वभाव ध्रुव ज्ञायकवस्तु है, उसका श्रद्धान-ज्ञान करके, मिथ्यात्व और शुभाशुभराग से विमुख होकर अन्तर्मुख एकाग्र होना - वह समाधिस्वरूप प्रतिक्रमण है।"
इस गाथा और उसकी टीका में मात्र इतना ही कहा गया है कि तीन गुप्तियों के धनी, निर्विकल्प समाधि में समाधिस्थ, आत्मध्यानी महामुनिराज परमसंयमी होने से प्रतिक्रमणस्वरूप ही हैं। तात्पर्य यह है कि वास्तविक प्रतिक्रमण आत्मध्यानी सन्तों के ही होता है||८|| इसके बाद टीकाकार मुनिराज एक छंद लिखते हैं, जो इसप्रकार है
(हरिणी) अथ तनुमनोवाचांत्यक्त्वासदा विकृतिमुनिः सहजपरमां गुप्तिं संज्ञानपुंजमयीमिमाम् । भजतु परमां भव्यः शुद्धात्मभावनया समं भवति विशदंशीलं तस्य त्रिगुप्तिमयस्य तत् ।।११८ ।।
(हरिगीत) सद्ज्ञानमय शुद्धात्मा पर है न कोई आवरण। त्रिगुप्तिधारी मुनिवरों का परम निर्मल आचरण॥ मन-वचन-तन की विकृतिको छोड़करहेभव्यजन!
शुद्धात्मा की भावना से परम गुप्ती को भजो ॥११८|| हे आसन्नभव्य मुनिजन ! मन-वचन-काय की विकृति को छोड़कर सम्यग्ज्ञानमयी सहज परम गुप्ति को शुद्धात्मा की भावना सहित उत्कृष्टरूप को भजो; क्योंकि त्रिगुप्तिधारी ऐसे मुनिराजों का चारित्र निर्मल होता है। - इस कलश में मात्र यही कहा गया है कि हे आसन्नभव्य मुनिजनो! मन-वचन-काय के माध्यम से व्यक्त होनेवाली विकृतियों को छोड़कर सम्यग्ज्ञानमयी सहज परम गुप्ति को शुद्धात्मा की भावना में एकाग्र होकर उत्कृष्टरूप से भजो; क्योंकि तीन गुप्तियों के धारी संतों का चरित्र अत्यंत निर्मल होता है। इसलिए वे स्वयं प्रतिक्रमण हैं, प्रतिक्रमणमय हैं।।११८।।. १. नियमसार प्रवचन, पृष्ठ ७१३ २. वही, पृष्ठ ७१५